बुधवार, जून 19, 2013

मैं ऐसा गीत बनाना चाहता हूं।



मैं ऐसा गीत बनाना चाहता हूं,
आदमी को आदमी के पास लाना चाहता हूं,
जाती धर्म की दिवारेम, हमने बनाई है,
न लड़ो इश्वर के नाम पर, ये समझाना चाहता हूं।

कर रहे हैं शिक्षित बच्चों को,
उच्च डिगरी ले पैसे कमाए,
दर दर भटकते मां बापों के,
किस्से सुनाना चाहता हूं।

देखो हम सब दौड़ रहे हैं,
जाना है कहां हम नहीं जानते,
इस दिशाहीन भाग दौड़ से,
मैं सब को बचाना चाहता हूं।

 काट डालो ये नफरत का वृक्ष,
प्रेम का अंकुर फूटने दो, 
जो नफरत है हमारे दिलों में,
बच्चों की उस से दूरी बनाना चाहता हूं।

सब से बड़ा है देश,
देश से बड़ा कुछ भी नहीं,
हर गली मौहले में,
ये क्रांती लाना चाहता हूं।

सोमवार, जून 03, 2013

कल था जहां राम राज्य



हर तरफ खुशहाली थी, कहते थे सौने की चिड़िया,
जग अंबर का सूरज था भारत, साक्षी है सारी दुनिया।
कैसा देश पे संकट आया, भ्रष्टाचार का कोहरा छाया,
कल था जहां राम राज्य, आज लंकेश ने वहां राज पाया।
चाहते   हैं नेता कुर्सी पाना, देश से उन्हे क्या लेना,
देखती है जंता नेता को,  कहती है देश ने उन्हे क्या देना,
बस केवल वोट लेने के लिए, नेताओं ने ये भ्रमित  जाल बिछाया,
कल था जहां राम राज्य, आज लंकेश ने वहां राज पाया।
अब रण में केवल कौरव  है, न पांडवों का अब डर  सताता,
द्रौण तो हैं जो व्यू रचेंगे, न भिष्म अब  मार्ग दिखाता,
पर अब मित्र कर्ण नहीं है, दुर्योधन ये न समझ पाया,
कल था जहां राम राज्य, आज लंकेश ने वहां राज पाया।
विश्वास है कृष्ण के वचन पर, आयेंगे वो फिर  धरा पर,
पुनः राम राज्य आयेगा, चमकेगा ये  सूरज फिर विश्व पटल पर,
 मिटेगा अंधेरा होगा सवेरा, इस आस में सदा तिरंगा लहराया।
कल था जहां राम राज्य, आज लंकेश ने वहां राज पाया।




शुक्रवार, अप्रैल 12, 2013

आया है अपना नव वर्ष।




आज उमंग तरंग है मन में,
आज खुशियां भरी है  तन में,
कह रहा है  कण कण आज,
आया है अपना नव वर्ष।

झूम रही है प्रकृति सारी,
लग रही है धरा स्वर्ग से प्यारी,
घर घर में पूजन हो रहा है,
आया है अपना नव वर्ष।

भर गए हैं  अन्न के भंडार,
हर तरफ है केवल बहार,
पतझड़ को कह के अलविदा,
आया है अपना नव वर्ष।

सजे  हैं मां के प्यारे दरवार,
जगदंबा की है कृपा अपार,
हो रही है सब पर कृपा की वर्षा,
आया है अपना नव वर्ष।


सब मिलकर नव वर्ष मनाना,
दिखावे के न इसे वस्त्र पहनाना,
ये वेदों का संदेश है लाया,
आया है अपना नव वर्ष।


नवसंवत 2070 की आप सब को हार्दिक शुभकामनाएं।

बुधवार, मार्च 27, 2013

मना रहे हैं सब मिलकर होली।

आती है होली हर बार,
लेकर रंगों की भरमार,
महक रही है प्रेम से धर्ती,
मना रहे हैं सब मिलकर होली।

सभी गले मिल रहे हैं,
प्रेम के फूल खिल रहे हैं,
देकर इक दुजे  को शुभकामनाएं,
मना रहे हैं सब मिलकर होली।

नफरत की जगह है दिलों में प्यार,
न जाती धर्म की है दिवार,
गिले शिकवे सब भूलकर,
मना रहे हैं सब मिलकर होली।

है होली का ये संदेश,
न नफरत न रखो क्लेश,
ऐसे लगे नित्य धरा पर,
मना रहे हैं सब मिलकर होली।
मना रहे हैं सब मिलकर होली।

रविवार, मार्च 17, 2013

मैं वोही करण हूं...

मैं वोही करण हूं जिसे कल,
  नदि में तुमने बहा दिया था,
आज आया हूं फिर धरा पर,
वोही हुआ फिर मेरे साथ...

मां कल बताई थी तुमने,
रो रोकर अपनी मजबूरी,
फिर किया है आज   मेरा त्याग,
क्या इतने वर्षों में न बदलले हालात...

जानता हूं तुम तो आज भी,
बतादोगी बेवशता पहले सी,
स्वार्थवश फिर कभी तुम,
रख दोगी मेरे सर पे हाथ...

फिर किसी राधा का आंचल मिलेगा,
ममता से मेरा बचपन खिलेगा,
न दे सकेगी वो मुझे पहचान,
बाणों की फिर होगी बरसात...

दानवीरता बनेगी मौत का कारण,
मित्र मिलेगा कोई दुर्योधन,
सेवा करके भी  मिलेगा शाप,
भाई से होगी केवल  रण में मुलाकात...

शनिवार, मार्च 16, 2013

मिलन न होगा...

कहा था तुमने कभी मुझसे,
सदा मुस्कुराना...
होंठों की इस मुस्कान को,
कभी न मिटाना...

उस वक्त मैंने भी आप से ये
वादा किया था...
तुम्हारे प्रेम  का तुम से,
सुंदर तोफा लिया था...
न जान सका तुम कहां गई,
नामुमकिन था तुम्हे भूल जाना...

फिर तुमसी जीवन में कोई और मिली,
चंद क्षणों के लिए प्रेम की कली खिली,
सोचा तुम फिर आ गयी,
पर वो तुम नहीं थी...
वो मिटाने आई थी मेरे अधरों की मुस्कान,
वो नागिन है, मैंने न पहचाना...
अब न प्रीय तुम हो,
न अब वो पहले सी  मुस्कान है,
तुम कहां हो, मैं कहां हूं,
हम दोनों ही अंजान  है...
मिलन न होगा चाहत है दिल में,
भाता है मन को, तुम पर कविता बनाना...

सोमवार, मार्च 04, 2013

कोई ऐसा गीत सुना दे।



कोकिला तु आज मुझे कोई ऐसा गीत सुनादे।
जो अतर्मन  में बस जाए, बीते  दिनों की याद भुलादे।

जो लिखा हो गीत मेरे लिए, हर शब्द हो जिस में प्रेम का,
वफा की महक हो जिसमे, मौन अधरों को हंसा दे।

किसी गीतकार के पास जाना, मेरे गमों की दास्ता सुनाना,
पवन से शीतलता ले जाना, जो सुंदर गीत बना दे।

प्रथम सुंदर उपवन  में जाना, वहां से प्रेम के पुष्प  लाना,
उन्हे इस चमन में लगाना,  मेरा उजड़ा चमन महका दे।

फिर यमुना तड पे जाना, श्याम की बंसी सुनकर आना,
वो प्यारी धुन मेरे कानों को भी  सुनाना, जो मेरी रुह को महकादे।


गीत इस मस्ति में गाना, जीवन में नए रंग भर दे।
इस टूटे दिल में फिर से, प्ेम की शीतल  गंगा बहादे।

शुक्रवार, फ़रवरी 22, 2013

मेरी कलम कहति है मुझसे...



भोर हो गयई नींद से जागो, कागज को हाथ में उठा लो,
 जंता को बताओ सत्य क्या है,   मेरी कलम कहती है मुझ से।

मैंने लिखी रामायण व गीता, बताया समाज को पवित्र थी सीता,
मचल रही हूं लिखने को आज भी, मेरी कलम कहती है मुझ से।

मैंने प्राधीन भारत की पीड़ा लिखी, सोए हिंदुस्तानियों को जगाया,
खून से आजादी की कहानी लिखी, मेरी कलम कहती है मुझ से।

चाहती हूं  भ्रष्टाचार मिटाना, पुनः राम राज्य लाना,
स्वतंत्र होती मैं कोई मुजरिम न बचता, मेरी कलम कहती है मुझ से।

बहुत कुछ है लिखने को मेरे पास, न है वालमीकि न है व्यास,
कौन लिखेगा, सत्य आज,  मेरी कलम कहती है मुझ से।

कालीदास आज भयभीत है, कलम का सिपाही गिन रहा है पैसे,
मैं तो दासी हूं लिखने वाले की, मेरी कलम कहती है मुझ से।



बुधवार, दिसंबर 26, 2012

नारी तुम और सशक्त बनो...



बन जाएंगे कड़े कानून, थम जाएगी देश में क्रांति,
कोई दरिंदा  दानव  आकर, फैला देगा फिर अशांति,
इस शोर गुल से कुछ न होगा, नारी तुम और सशक्त बनो।
सीता महिनों लंका में रही, न आ सका रावण उसके   पास,
झलकता था भय सीता   में उस को, नारी तुम और सशक्त बनो।
देख लक्ष्मी बाई की तलवार, मान गए थे फिरंगी हार,
कांप रहा था बृटिश   राज, नारी तुम और सशक्त बनो।
कल्पना चावला  से पूछो, क्या थी नारी,
किरण वेदी को देखो, क्या है नारी,
नारी का कल का इतिहास पढ़ो, नारी तुम और सशक्त बनो।
हीरण का शिकार करते हैं सभी, सिंह को कोई न हाथ लगाता,
विक्राल हाथी भी देखो, सिंह के न पास जाता।
जो आज हुआ है कल न होगा, नारी तुम और सशक्त बनो।

गुरुवार, दिसंबर 20, 2012

केवल भ्रम है...



कहां मरा है कीचक अभी,
कीचक न मरेगा कभी,
अगर कीचक मर जाता,
अबलाओं को कैसे नोच पाता।
कीचक को तुमने मार दिया
भीम ये तुम्हारा भ्रम है।

 गांव शहर हर मोड़ पर,
खडा है हैवानियत ओड़ कर,
मासूम नारियों पर करता है  वार,
कहता है समाज उसे बलातकार,
यौनशोषित नारी  जीवित है, 
सभ्य समाज ये तुम्हारा भ्रम है।

पांचाली ने आवाज लगाई,
दी थी श्याम  को वो आवाज सुनाई।
असंख्य नारियां करहा रही है,
श्याम  को बुला रही है,
बचाएंगे    श्याम आकर  लाज,
हिंद की बेटी  ये केवल भ्रम है।

पूजनीय है नारी जहां देवी समान,
होता है नारी का घर घर में संमान,
ये  अमानव दरिंदे कहां से आए,
जो नारी शक्ति को     समझ न पाए,
मिट गयी थी  रावण की हस्ति,
बचोगे तुम, तुम्हारा भ्रम है।

रविवार, दिसंबर 16, 2012

घायल लोकतंत्र

लोकतंत्र घायल पड़ा है, न्याय लहूलुहान पड़ा है,
सुनाई देती है संसद में, नेताओं की उच्छ आकांक्षाएं।

बिछी हुई है शकुनी की चौसर, भारत मां लगी है दाव पर,
सोच रहे हैं धर्मराज, कहीं कृष्ण न आ जाए।

राजधानी में बैठें हैं तकशक, भयभीत हैं देश की जंता,
भिष्म मौन है तब से आज तक, चाह कर भी न बोल पाए।

देखते हैं रोज संसद में तमाशा, फैंककता  है शकुनी वोट का पासा,
कर के नेता अभिनय, केवल जंता को भरमाए।

जागो जंता समय आ गया, लोकतंत्र पर कोहरा छा गया,
बुलाओ सुभाष को राज संभालो, भारत मां बार बार  बुलाए।