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शुक्रवार, मार्च 04, 2016

नया शड़यंत्र रचा रही।

अफज़ल गुरु,  मक़बूल भट
को शहीद कहना,  आजादी हो गयी,
जिन्हे दिया दंड कानून ने
उनकी फांसी भी,  शहादत हो गयी।
जो शहीद हुए देश पर
उनकी याद तक नहीं,
जो दहशत फैलाते हैं
उनकी जयजयकार हो रही।
दिखाएगा अब कौन पथ,
द्रौण भी  चक्रव्युह रचा रहे
शिक्षा के मंदिरों में भी  अब
घनघोर  रात हो गयी।
कहां है अर्जुन?
 श्रीकृष्ण कहां है?
कपटी शकुनी की चालें
नया शड़यंत्र रचा रही।



शनिवार, सितंबर 05, 2015

देश पर संकट है...

देख भारत की
दुर्दशा आज
उमीद है
परिवर्तन होगा
विश्वास है सब को
तुम आओगे...

जब जब भी
आया संकट
हम डरे नहीं
बुलाया तुमको
एक बार नहीं
 हर बार आये हो...

तुम्हारा दिया
गीता का ज्ञान
अब नहीं आता
समझ में किसी के
पुनः दो
हमे  वोही ज्ञान...

आज सनातन
धर्म फिर
बुला रहा है
श्याम तुम को
सनातन का  खतरा ही
देश पर संकट है...

रविवार, अगस्त 17, 2014

आओ श्याम, बंसीधर...


[पावन पर्व श्री कृष्ण जन्माष्टमी की शुभकामनाएं...]



आहत यमुना तुम्हे बुलाए,
गायें     पीड़ा किसे सुनाएं,
आस है सब की तुम्ही पर,
आओ श्याम,  बंसीधर...

दुष्ासन  छिपा है, हर मोड़ पे आज,
बचाओ हिंद की बेटी की लाज,
    व्याप्त है केवल मन में  डर,
आओ श्याम,  बंसीधर...

पाषाण हो गयी भावनाएं,
न रही अब मर्यादाएं,
हिंसा, भोग-विलास है अब,
आओ श्याम,  बंसीधर...

मात-पिता ही  शड़ियंत्र रचाते,
अजन्मी बेटी का अस्तित्व मिटाते,
सूना है,  बेटी बिन घर,
आओ श्याम,  बंसीधर...

भाई-भाई में बैर है,
सुत के लिये, मां गैर  है,
खंडित हो गये रिश्ते सब,
आओ श्याम,  बंसीधर...

सूनी है,  ब्रज की गलियां,
सूख गयी है,  मधुवन की कलियां,
मौन है,  वृक्ष  सब,
आओ श्याम,  बंसीधर...

कहा था तुमने,  आओगे,
 धर्म, मानवता  को, बचाओगे,
कहता भारत, आओ अब,
आओ श्याम,  बंसीधर...

मंगलवार, अगस्त 27, 2013

आना श्याम...



टूट गये हैं दिलों के बंधन,
उदास है हर घर आंगन,
जन्म हुआ था प्रेम का जिससे,
वो बंसी तुम  पुनः बजाओ...

अस्त हो गया धर्म का सूरज,
धुमिल हो गयी दिशा पूरव,
पथ भ्रष्ट हैं आज सभी,
गीता का अर्थ समझाओ...

नहीं भाता भीड़ बाजार,
जहां भी जाओ है अंधकार,
मन उदास है कहां जाएं,
श्याम अब आकर रास रचाओ... 
वचन तुम्हे निभाना होगा,
सुदर्शन पुनः उठाना होगा,
अस्तित्व धर्म का बचाना होगा,
आना  श्याम जल्दि आओ...

सोमवार, जून 03, 2013

कल था जहां राम राज्य



हर तरफ खुशहाली थी, कहते थे सौने की चिड़िया,
जग अंबर का सूरज था भारत, साक्षी है सारी दुनिया।
कैसा देश पे संकट आया, भ्रष्टाचार का कोहरा छाया,
कल था जहां राम राज्य, आज लंकेश ने वहां राज पाया।
चाहते   हैं नेता कुर्सी पाना, देश से उन्हे क्या लेना,
देखती है जंता नेता को,  कहती है देश ने उन्हे क्या देना,
बस केवल वोट लेने के लिए, नेताओं ने ये भ्रमित  जाल बिछाया,
कल था जहां राम राज्य, आज लंकेश ने वहां राज पाया।
अब रण में केवल कौरव  है, न पांडवों का अब डर  सताता,
द्रौण तो हैं जो व्यू रचेंगे, न भिष्म अब  मार्ग दिखाता,
पर अब मित्र कर्ण नहीं है, दुर्योधन ये न समझ पाया,
कल था जहां राम राज्य, आज लंकेश ने वहां राज पाया।
विश्वास है कृष्ण के वचन पर, आयेंगे वो फिर  धरा पर,
पुनः राम राज्य आयेगा, चमकेगा ये  सूरज फिर विश्व पटल पर,
 मिटेगा अंधेरा होगा सवेरा, इस आस में सदा तिरंगा लहराया।
कल था जहां राम राज्य, आज लंकेश ने वहां राज पाया।




मंगलवार, अक्टूबर 09, 2012

प्रेम पावन


दुनिया में हर रिश्ते को, कोई न कोई नाम मिला,

राधा कृष्ण के रिश्ते को, नाम मिला न अन्जाम मिला।

श्याम की रानियां थी अनेक, न उन में से राधा थी एक।

पर समर्पण था इन सब से अधिक, फिर भी न बैकुन्ठ धाम मिला।





सब ने कहा, मथुरा न जाओ, राधा ने कहा कर्तव्य निभाओ,

राधा का समर्पण, श्याम का स्नेह, राधा को श्याम सा मान मिला।



न आकर्षण, न दिखावा, ये था केवल प्रेम पावन,

ये सुनायी देता था श्याम की मुरली में, इसे जगदीश के हृदय में स्थान मिला।



लक्ष्मी स्वरूपा थी रुख्मणी, पर जग ने राधे श्याम कहा,

प्रेम श्रेष्ठ है भक्ति से, उद्धव को ये ज्ञान मिला।

शुक्रवार, अगस्त 10, 2012

krishan ka avahan कृष्ण का आवाहन। जन्माष्टमी

आती है गोपियां, ग्वाल बाल, आज भी यमुना के तट पर,
कहा था शाम ने  आएंगे वो, विश्वास है उन्हे उस वचन पर।
 यमुना आज पूछ रही है, शाम तुम कब आओगे,
मैं तुम्हारी दरशन की प्यासी, मुझे दर्श कब दिखाओगे।
एक बार सुनादो प्रभू,  मुर्ली में वो मिठी तान,
इन मुर्झाये अधरों पर, आ जायेगी फिर मुस्कान।
शान्त  होगी मेरी पीड़ा, जब रास यहां रचाओगे,
मैं तुम्हारी दरशन की प्यासी, मुझे दर्श कब दिखाओगे।
प्राधीन हुआ सारा देश, पर नटवर  तुम नहीं आये,
तुम बिन भारत माँ की, रक्षा हम कर   न पाये।
क्या मालूम था हमे नटवर, तुम वचन भूल जाओगे,
मैं तुम्हारी दरशन की प्यासी, मुझे दर्श कब दिखाओगे।
मुगलों और फिरंगियों ने, खूब अत्याचार किये,
निर्बल और निर्दोषों को, अमानवीय दन्ड दिये।
मैं सदा यही सोचती थी, तुम संकट से बचाओगे,
मैं तुम्हारी दरशन की प्यासी, मुझे दर्श कब दिखाओगे।
संकट में है  आज भारत, डूब रही है धर्म की नयीया,
पूरा करो अपना वचन, भूल न जाना अब कनहिया।
नाथ अब तो जल्दि आओ, और कितनी देर लगाओगे,
मैं तुम्हारी दरशन की प्यासी, मुझे दर्श कब दिखाओगे।