शनिवार, मई 07, 2016

काम नहीं नाम बिकता है...

सरहदों पर
खड़े हैं रक्षक
घर से दूर
मां की रक्षा के लिये।
पर हम नहीं जानते  उन्हें
बच्चे भी नहीं पहचानते उन्हें
क्योंकि उनकी लाइव कर्वेज नहीं होती।
 वे   अभिनय भी  नहीं कर रहे हैं।
उनका भाग्य मैदानों में लगने वाले
चौकों छक्कों पर निर्भर नहीं होता।
कहते हैं न,
जो दिखता है, वोही  बिकता है।
 एक किसान
 सब से अधिक काम करता है,
सुबह से शाम तक,
रात को भी नहीं सोता,
रखवाली करता है फसल की।
चिंता सताती है कर्ज की।
कई बार तो
दुखी होकर
आत्महत्या भी कर देता है।
क्योंकि वो जानता है
हमारे देश में
काम नहीं नाम बिकता है...

3 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर रचना बढ़िया पोस्ट ...

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  2. सच नाम वालों को ज्यादा मेहनत करने की जरुरत नहीं होती, उनके साथ हज़ार हाथ होते हैं .. किसान बेचारा अकेला ही मरता-खपता है सबके लिए, लेकिन उसे देखने वाला न का बराबर ..

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