शुक्रवार, अक्तूबर 25, 2019

दीपक बिना दिवाली कैसी.....

लाखों का सामान खरीदा,
हर बार की तरह दिवाली पर,
नहीं खरीदा एक भी दीपक,
दीपक बिना दिवाली कैसी.....

जगमग है घर आंगन,
रंगीन लड़ियों-लाइटों से,
दीपक नहीं जलाओगे तो,
दीपक बिना दिवाली कैसी.....

लड़ियां-लाइटे खरीद कर,
 जगमग हुआ तुम्हारा ही   घर,
 दीपों से मिटता दो घरों का    अंधेरा,
दीपक बिना दिवाली कैसी.....

जब जलता है दीपक पूजा में भी,
फिर मां लक्ष्मी के लिये ये दिखावा क्यों,
 श्री राम भी भाव के भूखें हैं,
दीपक बिना दिवाली कैसी.....

दिवाली पर केवल दीप जलाएं,
दिये बनाने वालों को भी हंसाएं,
उनके घरों में भी दिवाली मनेगी,
दीपक बिना दिवाली कैसी.....


मंगलवार, अक्तूबर 15, 2019

ये केवल सफेद छड़ी नहीं, दृष्टिहीनों की पहचान है....


दुनिया भर की  दृष्टिबाधित आबादी का  बहुत बड़ा हिस्सा हमारे देश भारत में निवास करता है | दृष्टिबाधित आबादी की आँखे है उनके हाथो से सटी रहने वाली वह सफ़ेद छड़ी
जो उन्हे पथ दिखाती है।   हर साल  15 अक्टूबर का दिन इस दृष्टिबाधित आबादी के लिए सबसे अहम दिन होता  है सफेद छड़ी न केवल दृष्टिबाधित
लोगों के स्वतंत्रता का प्रतीक है बल्कि समाज की उनके प्रति जिम्मेदारी और संवेदनशीलता को भी प्रतिबिंबित करती है।
इस दिवस पर सफेद छड़ी पर ये कविता मेरी ओर से.....
क्योंकि किसी भी  वस्तु का महत्व वोही जानता है, जो उसका उपयोग करता है।

 
जो साथ उनके  सदा रहती,
ये उनका स्वाभिमान है..,
ये केवल  सफेद छड़ी नहीं,
दृष्टिहीनों की पहचान है....
पथ में क्या है,, उन्हे बताती,
आत्म निरभरता का मंत्र सिखाती,
चलते हुए उनह्े  सुरक्षा देती,
ये दृष्टिहीन है,  चलने वालों को बताती।
साथ न कोई सदा चलेगा,
अकेले चलने में ही शान है,
ये केवल  सफेद छड़ी नहीं,
दृष्टिहीनों की पहचान है....
दृष्टिहीनों की दृष्टि बन,
हर ठोकर  से उन्हे बचाती है,
 स्वतंत्रता की प्रतीक है ये,
तिमिर में भी पथ दिखाती है।
दृष्टिहीनता अभिशाप नहीं, बाधा है,
उनका भी अपना आत्म-सन्मान है,
ये केवल  सफेद छड़ी नहीं,
दृष्टिहीनों की पहचान है....

ये भी सामान्य से समार्ट  बन गयी है,
बिना इसके दृष्टिहीन की सुरक्षा नहीं है,
हर दृष्टिहीन इसका उपयोग करे,
स्फेद छड़ी दिवस का संदेश यही है।
निडर होकर चलते रहो,
चलता है जो, उसका ही  सन्मान है,
ये केवल  सफेद छड़ी नहीं,
दृष्टिहीनों की पहचान है....
जिसने महत्व तुम्हे दिया,
हर पथ उसने पार किया,
वो आगे ही बढ़ता रहा,
लक्ष्य अंत में  पा ही लिया।
जो जीवन में संघर्श करता है,
उसे ही मिलता मकाम है,
ये केवल  सफेद छड़ी नहीं,
दृष्टिहीनों की पहचान है....

शनिवार, अगस्त 03, 2019

मेंहदी  

जब टूटता  हैं,
  पती पत्नी का पावन रिशता,
तब रोती है मेंहदी,
क्योंकि उसने ही,
इनके जीवन में
 प्रेम के रंग भरे थे......
मेंहदी  चाहती है,
सब में प्यार बढ़े,
केवल   प्रेम हो,
कोई आपस में न लड़े,
किसी के घर न टूटे,
किसी से बच्चे न छूटें.....
   मेंहदी  कहती है, 
अब विवाह केवल
पावन बंधन नहीं,
समझौता बन कर रह गया है।
कृतरिमता के इस दौर में,
मेरा मोल भी घटने लगा है.....