सोमवार, सितंबर 21, 2015

यही है सैनिक धर्म मेरा...

मैं और तुम
नहीं  जानते
एक दूसरे को
न मिले कभी
न हम दोनों का
बैर है कोई...

अगर मिलते
दिल्ली या लाहौर में
पूछता तुम से परिचय
परिचय देता अपना भी
संकट में होते
मदद भी  करता...

हो भले ही
तुम भी मुझसे
आज जंग है
दो देशों में
यहां तो  हम  केवल
  शत्रु हैं...

पर आज
हम दोनों का मिलन
रण-क्षेत्र में
हुआ है
हम दोनों को ही आज
सैनिक धर्म निभाना है...

हम दोनों में
जो मारा गया
वो शहीद कहलाएगा
जो  जिवित बचेगा
वो संमान पाएगा
अपने देश में...


न मैं तुमसे
मांग रहा हूं
भिक्षा अपने जीवन की
न जिवित तुम्हे
जाने दूंगा आज
यही है सैनिक धर्म मेरा...

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" मंगलवार 22 सितम्बर 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, दिल,दिमाग और आप - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. बहुत सुंदर ,बेह्तरीन अभिव्यक्ति !शुभकामनायें. और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

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  4. ‘ब्लॉग बुलेटिन’ की ११५०वीं पोस्ट आइये संकल्पित हों अपने जाँबाज़ सैनिकों के लिए - ११५०वीं बुलेटिन में आपकी इस पोस्ट को शामिल किया गया है. आपके सादर संज्ञान की तथा स्नेहिल सहयोग कि सदैव अपेक्षा रहेगी.. आभार...

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ये मेरे लिये सौभाग्य की बात है कि आप मेरे ब्लौग पर आये, मेरी ये रचना पढ़ी, रचना के बारे में अपनी टिप्पणी अवश्य दर्ज करें...
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