शुक्रवार, अक्तूबर 10, 2014

तुम तो खुद भी औरत हो


आयी थी मैंजब  इस घर में,
कहां था मैंने तुम को मां,
तुमने भी बड़े प्रेम से,
मुझे बेटी कहकर पुकारा था,
आज तुम्ही कह रही हो,
क्या दिया तुम्हे,  क्या लाया।
समझो मेरे मन के दर्द को।
तुम तो खुद भी  औरत हो,

मेरी शिक्षा की खातिर,
पिता ने दिन रात एक किये हैं,
मेरे विवाह की खातिर,
उन्होंने कयी कर्ज लिये हैं,
कहां से देंगे वो इतना दहेज,
ये सुन, मां मर जाएगी,
मां उन्हे  भी  जीने दो,
तुम तो खुद भी  औरत हो,

7 फेरे लेकर मैं,
आयी हूं  इस घर में,
अर्थी मेरी जाएगी,
केवल अब  इस घर से।
रूप रंग मेरे गुण देखो,
आयेगी लक्ष्मी,  तुम्हारे घर चलकर,
 मुझे स्नेह,  संमान दो,
तुम तो खुद भी  औरत हो,

15 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना शनिवार 11 अक्टूबर 2014 को लिंक की जाएगी........... http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. बहुत खूब |सुन्दर रचना |

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  3. बहुत सुंदर प्रस्तुति.
    इस पोस्ट की चर्चा, रविवार, दिनांक :- 12/10/2014 को "अनुवादित मन” चर्चा मंच:1764 पर.

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  4. सुधार करने के प्रयास में एक बेहतरीन रचना :)


    मेरे ब्लॉग पर आप आमंत्रित  हैं :)

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  5. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति...

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  6. मन को नाम करती बहुत भावुक रचना --
    सुंदर अनुभूति ----

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  7. नारी का प्रश्न नारी से ...
    अच्छी रचना ...

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  8. क्या कहने, बहुत सुंदर रचना
    कविता का भाव और प्रस्तुतिकरण बेजोड़

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ये मेरे लिये सौभाग्य की बात है कि आप मेरे ब्लौग पर आये, मेरी ये रचना पढ़ी, रचना के बारे में अपनी टिप्पणी अवश्य दर्ज करें...
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