शनिवार, अगस्त 03, 2019

मेंहदी  

जब टूटता  हैं,
  पती पत्नी का पावन रिशता,
तब रोती है मेंहदी,
क्योंकि उसने ही,
इनके जीवन में
 प्रेम के रंग भरे थे......
मेंहदी  चाहती है,
सब में प्यार बढ़े,
केवल   प्रेम हो,
कोई आपस में न लड़े,
किसी के घर न टूटे,
किसी से बच्चे न छूटें.....
   मेंहदी  कहती है, 
अब विवाह केवल
पावन बंधन नहीं,
समझौता बन कर रह गया है।
कृतरिमता के इस दौर में,
मेरा मोल भी घटने लगा है.....

13 टिप्‍पणियां:

  1. ओहहहो वाह बहुत सुंदर भाव कितने पवित्र है..सार्थक सृजन👌

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  2. बेहतरीन
    समझाइश देती रचना..
    आभार..
    सादर..

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  3. बहुत ही सुन्दर भावों से बंधी रचना
    सादर

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  4. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन जन्मदिवस - मैथिलीशरण गुप्त और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  5. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (05-08-2019) को "नागपञ्चमी आज भी, श्रद्धा का आधार" (चर्चा अंक- 3418) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  6. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना हमारे सोमवारीय विशेषांक
    ५ अगस्त २०१९ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  7. जी बहुत सुंदर और सार्थक सृजन।

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  8. सुंदर रचना
    महंदी का मौल होने लगा है यही सबसे घटिया बात है.

    पधारें कायाकल्प 

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  9. सच है ऐसे ही मेंहदी की संवेदना और उपयोगिता इंसान ने खत्म कर दी है ...
    सार्थक रचना है ...

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  10. बेहद खूबसूरत रचना

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  11. acchi rchnaa huyi he

    jaan kar sukhad ehsaas huya aap..Rohru Himachal se hain...main bhi Himachal Pradesh se hun...jila Una.


    bahut prsannnta huyi aapke blog tak aa ke

    जवाब देंहटाएं

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