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गुरुवार, नवंबर 26, 2015

अब जंता जाग रही है।

देख लिया है
अजमाकर उन को
जो राजा है
बहलाकर हम को।
हम भूल गये थे
अब तक खुद को
समझे थे आजादी
केवल शोषण को।
होते रहे खुश
हार पहनाकर
नेताओं की सभाओं में
तालियां बजाकर।
कुछ भी न बदला
सब कुछ वहीं है
अब जंता
जाग रही है।

नहीं सोचा कभी
हमे क्या दिया
अपनी जेवों  से भी
उनको ही दिया।
बदनाम हुए खुद
नयी पार्टी बनाई,
दागी छवी
नये चेहरों मे छुपाई।
भाषण-भरोसों पर
 विश्वास नहीं अब,
 फ्रेब चेहरे
और नहीं अब।
लोकतंत्र का
भविष्य यही है
अब जंता
जाग रही है।

हमे शासन नहीं
सुशासन चाहिये,
संसद में भी
अनुशासन चाहिये।
हमे वोट का
अधिकार मिला है
आजादी का
 उपहार मिला है।
आओ हम सब
कसम खाएं,
अपने वोटों को
पानी में न बहाएं।
गांव-गलियों में
आवाज यही है
अब जंता
जाग रही है।



गुरुवार, सितंबर 18, 2014

पीड़ित  है इस लिये     भारत मां...+


विदेशी हमने दूर भगाए,
अपने नियम, कानून बनाए,
अपनों को ही सत्ता दी,
पीड़ित  है फिर    भी भारत मां...

हिंदू मुस्लिम  के झगड़े सुलझाए,
भाषा जाति के विवाद  मिटाए,
दुश्मनों को भी हमने  मात दी,
पीड़ित  है फिर    भी भारत मां...

तुम मुझे वोट दो,
मैं तुम्हे खुशहाली दूंगा,
ये कहने वाले नेता बहुत हैं,
पीड़ित  है फिर    भी भारत मां...

विपक्षी चाहते कुर्सी पाना,
सत्ता पक्षियोम का है काम खाना,
पिस रही है बीच में  केवल   जंता,
पीड़ित  है इस लिये     भारत मां...

गुरुवार, जुलाई 24, 2014

तुम कुर्सी हो या नशा हो...

शिकस्त खाकर, अंतिम बार,
गया नेता कुर्सी के पास,
सन्बोधित करके कहा उसे,
तुम कुर्सी हो या नशा हो...

जीता था मैं जब चुनाव,
लगा स्वर्ग यहीं है,
संपूर्ण सुख भोगे मैंने,
तुम कुर्सी हो या नशा हो...

जंता आगे पीछे दौड़े,
मैं खुदा हूं, ऐहसास हुआ,
इमान धर्म मैं भूल गया था,
तुम कुर्सी हो या नशा हो...

मांगने गया था जब वोट,
किये थे वादे जंता से,
तुम्हे  पाकर, भूल गया सब,
तुम कुर्सी हो या नशा हो...

दुर्योधन मरा तुम्हारे लिये,
कन्स  ने पिता को बंदी बनाया,
श्री राम अमर हुए, तुम््हे त्यागकर,
तुम कुर्सी हो या नशा हो...

तुम नशवर हो, जाना अब,
हारा हूं, चुनाव जब,
फिर ख्वाइश है तुम्हे पाने की,
तुम कुर्सी हो या नशा हो...

शनिवार, मई 17, 2014

जंता का है ये आदेश...





जंता ने सोच-समझ कर,
दिया है  जनादेश,
लगता है सुर्क्षित है अब,
हमारा प्यारा भारत  देश...

सब से बड़ा लोकतंत्र,
प्रसन्न दिखा वर्षो बाद,
उमीदों की नयी सुबह हुई,
जन समर्थकों  का हुआ संसद में प्रवेश...

महंगाई  अब  दूर करना,
वापिस लाना काला धन,
तुम भी भ्रष्टाचार न करना,
ये है जंता का आदेश...


बुधवार, अप्रैल 16, 2014

गठबंधन की सरकार बनाएं...



कौन हैं दोस्त, शत्रु  कौन हैं,
इस प्रश्न पर सभी मौन हैं,
272 का हैं लक्ष्य पाना,
सिंह,  हीरन  को है,  साथ आना,
गिले शिकवे सब भूल जाएं,
गठबंधन की सरकार बनाएं...

जंता तो दे चुकी है वोट,
अब चाहो तो तुम ले लो नोट,
देंगे तुम्हे मंत्रि पद,
बढ़ जाएगा तुम्हारा भी कद,
खाया है सब ने, हम भी खाएं,
गठबंधन की सरकार बनाएं...

पांच वर्ष का समय,  नहीं है कम,
पा जाएं सत्ता, फिर कैसा गम,
पैसा असीम  है, सत्ता नशवर,
आरोप, दंड,  भी हैं नशवर,
समय अभी हैं, न बाद में पछताएं,
गठबंधन की सरकार बनाएं...


मंगलवार, दिसंबर 10, 2013

आम आदमी...[कुलदीप ठाकुर]



सोचा कैसे कुर्सी पाएं,
"आमआदमी" नाम से पार्टी बनाएं,
सब दलों को भ्रष्ट बताकर,
खुद को इमानदार बताएं...

जहां चुनाव केवल छलावा है,
कुर्सी के लिये बस दिखावा है,
जहां व्याप्त है केवल भ्रष्टाचार,
वहां पटेल, शास्त्रि   कहां से आये...

कभी तो   की पद यात्रा,
कभी  रथ यात्राएं निकाली,
कभी  चले साइकलों पर,
जंता पागल बनती जाए...

आसान नहीं है सिंहासन पाना,
पड़ता है झाड़ू तक भी उठाना,
जब सारे नुस्के फेल हो गये,
भाषण, वादे काम न आये...

समस्याओं में घिरा है "आम आदमी",
न वोट मांगता है "आम आदमी",
"आम आदमी" चाहता है केवल,
रोटी, कपड़ा, मकान मिल जाए...



शनिवार, अक्टूबर 19, 2013

मनमर्जी से देश चलाएं...



मैं भी चोर, तुम भी चोर,
फिर संसद में कैसा शोर,
क्यों इक दूजे पर आरोप लगाएं,
बंद कमरों में मुद्दे सुलझाएं...

जंता तो है भोलीभाली,
कोष देश का हो रहा है खाली,
100 प्रतिशत महंगाई बढ़ाएं,
कारण जंता को मिलकर समझाएं...

पांच पांच वर्ष दोनों को,
त्यागना होगा कुर्सी का मोह,
बारी बारी सरकार बनाएं,
आधा आधा दोनों खाएं...

शोर मचाना है भ्रष्टाचार,
गिरानी होगी आपसी दिवार,
एइक  दूजे को जेल जाने से बचाएं,
आरोपों की सभी फाइलें दफनाएं...

समझौता आपसी करना होगा,
वर्ना किया है जो, भरना होगा,
आओ दोनों हाथ मिलाएं,
मन मर्जी से देश चलाएं...