हम अब
नागरिक नहीं
रोबोट हैं
वोट हैं
लोकतंत्र में
हम बिकते हैं
खरीदे जाते हैं
डराए जाते हैं
रहना पड़ता है खामोश
हर चुनाव के पहले।
चुनाव के बाद
हमे होना पड़ता है
हर जीतने वाले के साथ
हारने वाला तो
अपनों को ही दोष देता है।
ऐसा भी नहीं कि
हमे कुछ नहीं मिला
कागजों के मत पत्र की जगह
इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन
और हजारों एग्जिट पोल के नतीजे।
भले ही
हम बांटे जाते हैं
जाति और क्षेत्र के नाम पर
पर मतदान केंद्रों पर
हम एक हो जाते हैं।
अगर हम सब एक हैं
फिर बंटते क्यों हैं?
डरते क्यों हैं?
हमारे पास शक्ती है
दुर्योधन को चुने या युधिष्ठिर को।
नागरिक नहीं
रोबोट हैं
वोट हैं
लोकतंत्र में
हम बिकते हैं
खरीदे जाते हैं
डराए जाते हैं
रहना पड़ता है खामोश
हर चुनाव के पहले।
चुनाव के बाद
हमे होना पड़ता है
हर जीतने वाले के साथ
हारने वाला तो
अपनों को ही दोष देता है।
ऐसा भी नहीं कि
हमे कुछ नहीं मिला
कागजों के मत पत्र की जगह
इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन
और हजारों एग्जिट पोल के नतीजे।
भले ही
हम बांटे जाते हैं
जाति और क्षेत्र के नाम पर
पर मतदान केंद्रों पर
हम एक हो जाते हैं।
अगर हम सब एक हैं
फिर बंटते क्यों हैं?
डरते क्यों हैं?
हमारे पास शक्ती है
दुर्योधन को चुने या युधिष्ठिर को।