सोमवार, दिसंबर 21, 2015

अखंड भारत देश  चाहिये।

जो वतन को बांट रहे हैंं,
लोकतंत्र की जड़े काट रहे हैं,
 कह दो उनसे
दिन नहीं अब उनके,
अब दल तंत्र नहीं
 जनतंत्र ही होगा,
राज्य राम का
न खंडित होगा
न होता जयचंद
हम गुलाम न होते,
कई सदियों तक
 गुम नाम न होते।
हमे एक दल नहीं
स्वदेश चाहिये,
केवल देश नहीं
अखंड भारत देश  चाहिये।

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" मंगलवार 22 दिसम्बर 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. बेहद प्रभावशाली.....बहुत बहुत बधाई.....

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