शनिवार, दिसंबर 12, 2015

माता सुनी कुमाता  

पूत कपूत सुने है
 पर न माता सुनी कुमाता
 अगर ये कहावत
पशु-पक्षियों  के लिये कही गयी होती
तो सत्य मान लेता...
क्योंकि मैंने
एक जानवर को
उसके अपने  बच्चे से
बिछड़ने पर
रोते देखा है...
न देखा है कभी
किसी पक्षी को
त्यागते हुए
अपने बच्चों को
संवेदनशील है वो मानवों से अधिक...
ये बात वेद-पुर्ाणों में
कही गयी है
हो सकता है
किसी युग में
माता केवल सुमाता ही होती हो...
पर आज  ये  बालक
जिन्हे त्याग दिया
बेवजह ही इनकी माताओं ने
 करण की तरह जानते हैं
 अपनी माताओं का सत्य...
ये भले ही
प्रसन्न दिखते हों
पर जीवन का  सबसे बड़ा अभाव
इन के उदास नेत्रों में
कभीकभार झलकता तो   है ही है...
इन की माताएं
किसी उच्च कुल की महारानी बन
अपने अतीत का सत्य छुपाए
एक और महाभारत के बहाने
इनके शवों पर रोने के लिये तैयार बैठी हैं...


4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (13-12-2015) को "कितना तपाया है जिन्दगी ने" (चर्चा अंक-2189) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. संवेदनपूर्ण रचना
    जानवर भी हमारे तरह कुछ हद तक संवेदनशील होते हैं

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