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शनिवार, दिसंबर 12, 2015

माता सुनी कुमाता  

पूत कपूत सुने है
 पर न माता सुनी कुमाता
 अगर ये कहावत
पशु-पक्षियों  के लिये कही गयी होती
तो सत्य मान लेता...
क्योंकि मैंने
एक जानवर को
उसके अपने  बच्चे से
बिछड़ने पर
रोते देखा है...
न देखा है कभी
किसी पक्षी को
त्यागते हुए
अपने बच्चों को
संवेदनशील है वो मानवों से अधिक...
ये बात वेद-पुर्ाणों में
कही गयी है
हो सकता है
किसी युग में
माता केवल सुमाता ही होती हो...
पर आज  ये  बालक
जिन्हे त्याग दिया
बेवजह ही इनकी माताओं ने
 करण की तरह जानते हैं
 अपनी माताओं का सत्य...
ये भले ही
प्रसन्न दिखते हों
पर जीवन का  सबसे बड़ा अभाव
इन के उदास नेत्रों में
कभीकभार झलकता तो   है ही है...
इन की माताएं
किसी उच्च कुल की महारानी बन
अपने अतीत का सत्य छुपाए
एक और महाभारत के बहाने
इनके शवों पर रोने के लिये तैयार बैठी हैं...


शुक्रवार, सितंबर 19, 2014

किसने यहां क्याहै  पाया...

सांझ हुई तो घर आये पंछी,
नीड़ अपना, टूटा पाया।
रैन बिताई,  पेड़ो पर
भोर हुई तो नव नीड़ बनाया...
जो हुआ उसे भूल गये,
फिर हर पल अगला  हंस के बिताया।
यहां तो सब कुछ नशवर हैं,
किसने यहां क्याहै  पाया...