शुक्रवार, सितंबर 19, 2014

किसने यहां क्याहै  पाया...

सांझ हुई तो घर आये पंछी,
नीड़ अपना, टूटा पाया।
रैन बिताई,  पेड़ो पर
भोर हुई तो नव नीड़ बनाया...
जो हुआ उसे भूल गये,
फिर हर पल अगला  हंस के बिताया।
यहां तो सब कुछ नशवर हैं,
किसने यहां क्याहै  पाया...
 

6 टिप्‍पणियां:

  1. Bahut hee sateek baat kahi apney, jeewan bass yunhi chalta rehta hai, koi kya khoyega aur kya payega............

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  2. सच में इंसान से कहीं अधिक समझदार ये पंछी हैं जिन्हें मोहमाया व्याप्त नहीं होती ! वे तटस्थ होकर हर परिस्थिति का सामना करते हैं और उसे स्वीकार भी कर लेते हैं !

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    1. मेरे ब्लौग पर आप का स्वागत, व रचना पर टिप्पणी के लिये आभार।

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (20-09-2014) को "हम बेवफ़ा तो हरगिज न थे" (चर्चा मंच 1742) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. चर्चा मुझे मुझे स्थान मिला....
      आभार।

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