गुरुवार, सितंबर 25, 2014

हे ईश्वर...

हे ईश्वर,
तुम्हारे मंदिर में,
आते हैं वो,
जिन के पास
होता है सब कुछ,
और पाने की इच्छा लिये
तुम्हे प्रसन्न करने के लिये,
चढ़ाते हैं चढ़ावा।
और ये  सोचकर
मन ही मन में
प्रसन्न  होते हैं,
 कि तुम प्रसन्न हो गये हो...

तुम्हारे मंदिर के बाहर,
तुम्हारे भक्तों के सामने,
एक के बाद दूसरा
दोनों हाथ फैलाता हुआ
अपनी विवशता बताता हुआ,
नजर आता है।
ये देखकर सोचता हूं,
वो तुम से क्यों नहीं मांगता?
हरएक के आगे  क्यों गिड़गिड़ाता है?
क्या तुम भी उसकी नहीं सुनते,
वो हर आने जाने वाले से,
मांगता है तुम्हारे नाम पर...

10 टिप्‍पणियां:

  1. आते तो दोनों ही हैं उसके द्वार ... पर सबकी अपनी अपनी किस्मत ...

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  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (26.09.2014) को "नवरात महिमा" (चर्चा अंक-1748)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है, धन्यबाद। नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें।

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    1. नमस्ते सर...
      आप का धन्यवाद आप ने मुझे अपनी चर्चा में स्थान दिया।

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  3. बहुत सटीक प्रश्न...

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  4. मन को उद्वेलित करने वाला प्रश्न ! क्या सच में ईश्वर भेंट (चढ़ावा ) से खुश होते हैं ?
    नवरात्रि की हार्दीक शुभकामनाएं !
    शुम्भ निशुम्भ बध -भाग ३

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  5. सटीक प्रश्न उठाती पोस्ट
    नवरात्रि की हार्दीक शुभकामनाएं !

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    उत्तर
    1. धन्यवाद भाई संजय जी...

      हटाएं

ये मेरे लिये सौभाग्य की बात है कि आप मेरे ब्लौग पर आये, मेरी ये रचना पढ़ी, रचना के बारे में अपनी टिप्पणी अवश्य दर्ज करें...
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