बुधवार, सितंबर 10, 2014

मेरे गांव का वो वृक्ष

मेरे गांव का वो वृक्ष,
जिसकी छाया में हम,
बैठकर घंटों,
बाते किया करते थे...
हम सोचा करते थे,
यहां आस पास कोई नहीं है,
पर वो खामोश वृक्ष,
सब कुछ सुना करता था...

इसी लिये वो वृक्ष भी,
हम दोनों के जुदा होने पर,
बुलाता है तुम्हे अक्सर,
मुझ से भी कुछ कहना चाहता है...
 

8 टिप्‍पणियां:

  1. बिछुड़ने का दुःख सबको रहता है कुछ व्यक्त कुछ अव्यक्त

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    1. ठीक कहा है आपने...


      सादर।

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  2. वृक्ष प्राचीन काल से साक्षी रहे हैं ,बोल भले न पायें ,पर सुनते तो हैं ही !

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