शनिवार, मई 09, 2020

मातृ दिवस--विशेष:शायद ये कलियुग ही है,हम मात्री दिवस मनाते हैं,



मां जब तक धरा पर रहती है,
सुत की खातिर दुख सहती है,
खुद भूखी रह, उसे खिलाती,
कभी ईशवर, गुरु बन जाती।
चिंता करती सुत की हर पल,
देती आशीश, सुनहरा हो कल।
सबसे बड़ा मंदिर है घर,
मां ही है, वहां  पर ईश्वर,
नहीं देखा ईश्वर को कभी,
करते हैं पूजा उसकी फिर भी।
जड़ के सूख जाने पर,
 हर   वृक्ष  सूख जाता है,
निज फूलों को मुरझाते देख,
केवल मां वृक्ष ही मुरझाता है।
शायद ये कलियुग ही है,
हम मात्री दिवस मनाते हैं,
मां की ममता को सीमित करके,
हम हर्षित हो जाते हैं।
नहीं चाहिये मां को दिवस,
मां देख के तुम्हे, खुश होजाती है,
रूखा सूखा जो भी दोगे,
दे आशीष तुम्हे, सो जाती है.।

5 टिप्‍पणियां:

  1. वाह!!!
    सुन्दर सटीक एवं सार्थक सृजन।

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  2. मातृ दिवस पर सुन्दर प्रस्तुति।

    जवाब देंहटाएं
  3. भावपूर्ण रचना, पांच लिंकों का आनंद, हलचल में मेरी रचना को स्थान देने के लिए आभार, उसका लिंक खुल नहीं रहा है

    जवाब देंहटाएं

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