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शनिवार, जून 24, 2017

पर खुद भूखे मर रहे हैं।

किसान आज से नहीं,
सदियों से आत्महत्या कर रहे हैं,
उगाते तो हम  अनाज हैं,
पर खुद भूखे मर रहे हैं।
मैंने एक और किसान कि
 आत्महत्या के बाद
आंदोलन कर रही भीड़ के
एक बूढ़े किसान से पूछा
वो किसान क्यों मरा?
"बेटा वो मरा नहीं
आज तो वो   जिवित हुआ,
मरा तो वो पहले कई बार,
  एक बार नहीं हजार बार
न तब कोई आंदोलन हुए,
न कोई चर्चा,
ये केवल वोट के भूखे,
इस आग को सुलगा रहे हैं"
उगाते तो हम  अनाज हैं,
पर खुद भूखे मर रहे हैं।
वो बुढ़ा किसान
कांपते स्वर में फिर बोला,
"ये आंदोलन थम जाएगा,
एक और किसान की आत्महत्या तक,
यही  हुआ है, होगा भी यही,
बंटे  हुए हैं जब तक किसान,
जब तक हम सभी किसान,
आत्महत्या कर रहे किसानों की पीड़ा को
अपनी पीडा नहीं मान लेते,
 आंदोलन हम स्वयम् नहीं,
इशारों से करते रहेंगे,
तब तक किसान भी
आत्महत्या करते ही रहेंगे।
हमे आपस में बांट कर,
वो  कुर्सी के लिये पथ बना रहे हैं"
उगाते तो हम  अनाज हैं,
पर खुद भूखे मर रहे हैं।


शुक्रवार, मार्च 11, 2016

जरूरत है...

भारत को आज फिर से
श्री राम की जरूरत है,
अर्जुन धर्म संकट में है,
श्री गीता की जरूरत है।
उठ रही है फिर आवाजें
भारत को खंडित करने की,
अखंड भारत कह रहा है,
सरदार पटेल की जरूरत है,
  देश की रक्षक  सैना आज भी
निर्भय खड़ी है सरहदों पर,
मां भारती से कह रहे हैं,
नेता सुभाष    की  जरूरत है।
भारत मां की जय कहने में
लाज आती है जिन को आज,
उनको समझाने की खातिर,
विवेकानंद की जरूरत है।
बताओ उनहें सिख गुरुों ने,
कैसे-कैसे कुर्वानी की,
आजाती के शहीदों की,
 कथा सुनाने की जरूरत है।
 

बुधवार, फ़रवरी 17, 2016

दुर्योधन को चुने या युधिष्ठिर को।

हम  अब
 नागरिक नहीं
रोबोट हैं
वोट हैं
लोकतंत्र में

हम बिकते हैं
खरीदे जाते हैं
डराए जाते हैं
रहना पड़ता है खामोश
हर चुनाव के पहले।

चुनाव के बाद
हमे होना पड़ता है
हर जीतने वाले के साथ
हारने वाला तो
अपनों को ही  दोष देता है।

ऐसा भी नहीं कि
हमे कुछ नहीं मिला
कागजों के मत पत्र की जगह
 इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन 
और हजारों  एग्जिट पोल के नतीजे।
भले ही
हम बांटे जाते हैं
जाति और क्षेत्र के नाम पर
पर मतदान केंद्रों पर
हम एक हो जाते हैं।

अगर  हम सब  एक हैं
फिर बंटते क्यों हैं?
डरते क्यों हैं?
हमारे पास शक्ती है
दुर्योधन को चुने या युधिष्ठिर   को।

शनिवार, जनवरी 23, 2016

तब तक  कैसे बदलेगा समाज  और देश।

हम सब
चाहते हैं बदलना
समाज  को,
देश  को।
चाहते हैं हम
कड़े कानून बने
पर क्या हम खुद
हर कानून का पालन करते हैं?।
  चाहते हैं सभी
भ्रष्टाचार न हो
जब देते हैं हम
तभी कोई रिशवत लेता है।
दशम गुरु ने पहले खुद
अर्पण किये  चार लाल
फिर कहा सब से
शहादत दो।
नहीं बदलते
जब तक खुद को
तब तक  कैसे बदलेगा
समाज  और देश।

शनिवार, नवंबर 07, 2015

हर जंग कलम ने ही जीती है...

ओ लिखने वालो
तुम्हारे पास
वो शब्द हैं
जो बदल सकते हैं
पवन की दिशा
जिन के बल पर
तुम
क्रांती ला सकते हो...
तुम्हारे पास
कलम की ताकत है
वो कलम
जिसका लिखा
रामायण का
एक एक शब्द
भविष्य में
सत्य हुआ...
आद तुम ही
और शस्त्र
हाथ में लिये
कलम के बिना भी
बदलना चाहते हो
आज के हालातों को
कैसे लिखने वाले हो
जो कलम को ही  भूल गये...
साक्षी है समय
कलम के  सिपाहियों ने
विश्व में आज तक
असंख्य क्रांतियां लाई है
कौन कहता है
शस्त्रों से जीती जाती है जंग
जानो, पढ़ो इतिहास
हर जंग कलम ने ही जीती है...

रविवार, नवंबर 09, 2014

ये क्रांति लाना चाहता हूं...

तुम दे दो अपने शब्द मुझे,
मैं गीत बनाना चाहता हूं,
सोए हैं जो निदरा में,
उन्हे जगाना चाहता हूं...

नहीं मिलती, मजदूर को मजदूरी,
कर रहा है किसान आत्महत्या,
गांव कली के  हर बच्चे को,
स्कूल भिजवाना चाहता हूं...

प्रताड़ित हो रही   है औरत घर में,
लड़कियों के लिये   पग-पग पे खतरा,
गर्भ में पल रही बेटियों का,
जीवन बचाना चाहता हूं...

मृत हो गया है यौवन आज,
नशे से अनेकों होनहारों का,
नशे के सभी   गिरोह को,
फांसी पे चढ़ाना चाहता हूं....

शोषण न हो किसी का,
सभी को न्याय मिले,
 अंजान न हो   अधिकारों से कोई,
ये क्रांति लाना चाहता हूं...