गुरुवार, जुलाई 24, 2014

तुम कुर्सी हो या नशा हो...

शिकस्त खाकर, अंतिम बार,
गया नेता कुर्सी के पास,
सन्बोधित करके कहा उसे,
तुम कुर्सी हो या नशा हो...

जीता था मैं जब चुनाव,
लगा स्वर्ग यहीं है,
संपूर्ण सुख भोगे मैंने,
तुम कुर्सी हो या नशा हो...

जंता आगे पीछे दौड़े,
मैं खुदा हूं, ऐहसास हुआ,
इमान धर्म मैं भूल गया था,
तुम कुर्सी हो या नशा हो...

मांगने गया था जब वोट,
किये थे वादे जंता से,
तुम्हे  पाकर, भूल गया सब,
तुम कुर्सी हो या नशा हो...

दुर्योधन मरा तुम्हारे लिये,
कन्स  ने पिता को बंदी बनाया,
श्री राम अमर हुए, तुम््हे त्यागकर,
तुम कुर्सी हो या नशा हो...

तुम नशवर हो, जाना अब,
हारा हूं, चुनाव जब,
फिर ख्वाइश है तुम्हे पाने की,
तुम कुर्सी हो या नशा हो...

16 टिप्‍पणियां:

  1. कुर्सी का नशा जिसे लगा वह फिर जाता कहाँ है। .
    कुर्सी की माया अपरम्पार है
    बहुत बढ़िया

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शुक्रवार (25-07-2014) को "भाई-भाई का भाईचारा"(चर्चा मंच-1685) पर भी होगी।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. कुर्सी भी ज़र ,जोरू ,जमीं के समूह में सामिल है |
    अच्छे दिन आयेंगे !

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  4. ब्लॉग बुलेटिन की आज शुक्रवार २५ जुलाई २०१४ की बुलेटिन -- कुछ याद उन्हें भी कर लें– ब्लॉग बुलेटिन -- में आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार!

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  5. दुनिया कुर्सी की दीवानी ऐसे ही थोड़े ना है?सुन्दर

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