शुक्रवार, जुलाई 04, 2014

कभी तो यहां भी आया करो...




[कौलिज के समय लिखी चंद पंखतियां, आज इस ब्लौग पर  प्रस्तुत कर रहा हूं]
कभी तो यहां भी आया करो,
नाम लेकर मेरा बुलाया करो,
हर महफिल रौशन है तुम से,
एक दीपक, यहां भी जलाया करो,

दिन उदास है तुम बिन,
दिखता है रात को ख्वाब तुम्हारा
अमावस है जीवन में आज कल,
चांद बनकर छाया करो...

पुष्प से प्यारी तुम्हारी मुस्कान,
कोयल से मीठी  तुम्हारी  वाणी,
सौंदर्य में तुम रति हो,
प्रेम गीत, कंठ से गाया करो...

सोचता हूं कभी कभी,
तुम किस जहां की हूर हो,
आयी हो यहां किस के लिये,
ये सच्च भी बताया करो...

6 टिप्‍पणियां:

  1. कॉलेज के दिन मस्ती भरे दिन
    ख्यालों में बार बार डूबता मन

    बहुत खूब!

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (05-07-2014) को "बरसो रे मेघा बरसो" {चर्चामंच - 1665} पर भी होगी।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. सुंदर प्रेम कविता

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  4. सच में बहुत अच्छी अभिव्यक्ति!

    उत्तर देंहटाएं

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