बुधवार, जून 19, 2013

मैं ऐसा गीत बनाना चाहता हूं।



मैं ऐसा गीत बनाना चाहता हूं,
आदमी को आदमी के पास लाना चाहता हूं,
जाती धर्म की दिवारेम, हमने बनाई है,
न लड़ो इश्वर के नाम पर, ये समझाना चाहता हूं।

कर रहे हैं शिक्षित बच्चों को,
उच्च डिगरी ले पैसे कमाए,
दर दर भटकते मां बापों के,
किस्से सुनाना चाहता हूं।

देखो हम सब दौड़ रहे हैं,
जाना है कहां हम नहीं जानते,
इस दिशाहीन भाग दौड़ से,
मैं सब को बचाना चाहता हूं।

 काट डालो ये नफरत का वृक्ष,
प्रेम का अंकुर फूटने दो, 
जो नफरत है हमारे दिलों में,
बच्चों की उस से दूरी बनाना चाहता हूं।

सब से बड़ा है देश,
देश से बड़ा कुछ भी नहीं,
हर गली मौहले में,
ये क्रांती लाना चाहता हूं।

10 टिप्‍पणियां:

  1. आपके जज़बात को नमन
    काश
    आप जो सोच रहें हैं
    सच हो जाये
    आमीन
    हार्दिक शुभकामनायें

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत अच्छा लिखा है जनाब

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपके भावों ने तो शब्द बन्धन भी तोड दिए……
    बहुत शुद्ध अन्तरमन से निकले जज़बात और उनकी पूर्णता के लिए शुभकामनाएं

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत अच्छा लिखा है आप ने , मुझे आप की रचना बहुत अच्छी लगी , आप ऐसे हे लिखते रहे शुभकामनाएं,

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत अच्छा लिखा है आप ने , मुझे आप की रचना बहुत अच्छी लगी , आप ऐसे हे लिखते रहे शुभकामनाएं,

    उत्तर देंहटाएं
  6. ये सुंदर भाव सबके दिल में आ जाय यही कामना बहुत सुंदर रचना और अभिव्यक्ति .......!!

    उत्तर देंहटाएं
  7. ये सुंदर भाव सबके दिल में आ जाय यही कामना बहुत सुंदर रचना और अभिव्यक्ति .......!!

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत सुंदर भाव हैं .....यही जज़्बा बनाए रहें और बांटे भी ...॥अगर पढ़कर कुछ ही लोगों का मन पलटे तो समझें क्रांति आ गई ...
    सुंदर जज़्बा ....शुभकामनायें ....

    उत्तर देंहटाएं
  9. अच्छी संदेश परक रचना बधाई ।

    उत्तर देंहटाएं

ये मेरे लिये सौभाग्य की बात है कि आप मेरे ब्लौग पर आये, मेरी ये रचना पढ़ी, रचना के बारे में अपनी टिप्पणी अवश्य दर्ज करें...
आपकी मूल्यवान टिप्पणियाँ मुझे उत्साह और सबल प्रदान करती हैं, आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है !