शनिवार, जनवरी 13, 2018

न जलता है अब वो आलाव

मेरे बचपन के दिनों में,
जब होता था हिमपात,
जलाकर आती-रात तक  आलाव,
बैठते थे सब एक साथ....
याद आती हैं सबसे अधिक
पूस-माघ की वो लंबी  रातें,
दादा-दाती की कहानियां,
बजुरगों की कही  सच्ची बातें....
अब तो  बर्फ के दिनों में भी,
आलाव नहीं, आग जलती है,
जो कर गये स्थान रिक्त,
उनकी कमी  खलती हैं....
बैठते तो हैं आज भी,
आग जलाकर एक साथ,
सबके हाथ में मोबाइल होता है,
नहीं करते आपस में बात....
न जलता है अब वो आलाव,
न वो मेल-मिलाप रहां,
न पहले सी बर्फ गिरती है,
अब पहले से लोग कहां....

5 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (14-01-2018) को "मकर संक्रंति " (चर्चा अंक-2848) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हर्षोंल्लास के पर्व लोहड़ी और मकर संक्रान्ति की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. निमंत्रण पत्र :
    मंज़िलें और भी हैं ,
    आवश्यकता है केवल कारवां बनाने की। मेरा मक़सद है आपको हिंदी ब्लॉग जगत के उन रचनाकारों से परिचित करवाना जिनसे आप सभी अपरिचित अथवा उनकी रचनाओं तक आप सभी की पहुँच नहीं।
    ये मेरा प्रयास निरंतर ज़ारी रहेगा ! इसी पावन उद्देश्य के साथ लोकतंत्र संवाद मंच आप सभी गणमान्य पाठकों व रचनाकारों का हृदय से स्वागत करता है नये -पुराने रचनाकारों का संगम 'विशेषांक' में सोमवार १५ जनवरी २०१८ को आप सभी सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद !"एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

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  3. समय के इस बदलाव को बाखूबी लिखा है ... अब वो बातें मस्तियाँ मोबाइल में खो गयी हैं ...

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ये मेरे लिये सौभाग्य की बात है कि आप मेरे ब्लौग पर आये, मेरी ये रचना पढ़ी, रचना के बारे में अपनी टिप्पणी अवश्य दर्ज करें...
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