सोमवार, अगस्त 11, 2014

वो तो अभी ख्वाब है...



जो दिया था तुम्हे खुदा ने,
वो तुम्हारी तकदीर थी,
जो तुम पाना चाहते हो,
वो तो  अभी ख्वाब है...

बोला मिर्जा,  साहेबा से,
आज तुमने बेवफाई की,
वफा करोगे अगले जन्म में,
वो तो  अभी ख्वाब है...

सफर आधा कट चुका,
सफर आधा बाकी है,
कोई अब साथ चलेगा,
वो तो  अभी ख्वाब है...


जो शब्द  मेरे मौन है,
वो मौन रहेंगे शायद सदा,
उन शब्दों  को कोई सुनना चाहेगा,
वो तो  अभी ख्वाब है...

चाहत है दिल में यही,
आता रहूं मैं काम सब के,
ये जीवन किसी के काम आयेगा,
वो तो अभी ख्वाब है...

शनिवार, अगस्त 09, 2014

राखी के इस धागे में...

[पावन पर्व रक्षाबंधन की असंख्य शुभकामनाएं...]

भाई बहन का संबंध,
पावन है सब से,
ये संदेश है,
राखी के इस धागे में...

बहन का  प्रेम,
भाई का वचन,
सावन की खुशबू है,
राखी के इस धागे में...

प्राचीन परंपरा,
रिशते की पावनता,
भारत का गौरव है,
राखी के इस धागे में...

राष्ट्र प्रेम,
धर्म की रक्षा,
नारी सन्मान है,
राखी के इस धागे में...

बहन  का त्याग,
भाई  का बलिदान,
दिखावा नहीं, निष्ठा है,
राखी के इस धागे में...

सोमवार, अगस्त 04, 2014

मां उदास हूं, तुम बिन शहर में



मां उदास हूं, तुम बिन शहर में,
दिखते हैं ख्वाब, बस  गांव के,
चलना पड़ता हैं, यहां संभल के,
 काम ही काम, न आराम  यहां...

यहां आदमी तो  असंख्य हैं,
नज़र आता नहीं, इनसान यहां,
खामोशी है, न घर कोई,
दिखते हैं केवल, मकान यहां...               

यहां  फूलों में, वो खुशबू नहीं,
विहग भी,  गीत गाते नहीं,
पहचानते हैं, सब मुझे,
फिर भी हूं, अंजान यहां...

कहा था तुमने, शहर जाना,
पढ़ना-लिखना, पैसे कमाना,
न मिलती पैसे में, तुम्हारी मम्ता,
दौड़ाता है हरपल, तुफान यहां...

गुरुवार, जुलाई 24, 2014

तुम कुर्सी हो या नशा हो...

शिकस्त खाकर, अंतिम बार,
गया नेता कुर्सी के पास,
सन्बोधित करके कहा उसे,
तुम कुर्सी हो या नशा हो...

जीता था मैं जब चुनाव,
लगा स्वर्ग यहीं है,
संपूर्ण सुख भोगे मैंने,
तुम कुर्सी हो या नशा हो...

जंता आगे पीछे दौड़े,
मैं खुदा हूं, ऐहसास हुआ,
इमान धर्म मैं भूल गया था,
तुम कुर्सी हो या नशा हो...

मांगने गया था जब वोट,
किये थे वादे जंता से,
तुम्हे  पाकर, भूल गया सब,
तुम कुर्सी हो या नशा हो...

दुर्योधन मरा तुम्हारे लिये,
कन्स  ने पिता को बंदी बनाया,
श्री राम अमर हुए, तुम््हे त्यागकर,
तुम कुर्सी हो या नशा हो...

तुम नशवर हो, जाना अब,
हारा हूं, चुनाव जब,
फिर ख्वाइश है तुम्हे पाने की,
तुम कुर्सी हो या नशा हो...

बुधवार, जुलाई 23, 2014

आज भी मुझ को...

उस दिन मैं, जब मिला था तुम से,
वो दिन  याद है, आज भी मुझ को,
तुम्हारी प्यारी-प्यारी बातें,
सुनाई देती हैं, आज भी मुझ को...

साक्षी  है वो वृक्ष आज भी,
छाया मैं जिसकी बैठे थे,
मंद-मंद वो शीतल पवन,
देती है शीतलता,   आज भी मुझ को...

चाहता था मैं साथ चलना,
तुम्हे ये मंजूर नहीं था,
जहां हम अलग हुए,
बुलाता है वो मोड़, आज भी मुझ को...

शायद तुम भूल गयी हो,
वो सावन, वो रिमझिम वर्षा,
 प्रेम के  फूल, जो सूख गये हैं,
देते हैं खुशबू, आज भी मुझ को...

शुक्रवार, जुलाई 18, 2014

सावन...

उदास हुआ दिल आज फिर से,
जब झूम- झूम कर आया सावन,
वोही पुराने ज़ख्म लेकर,
जोर-जोर से बरसा सावन।

हर तरफ जब  हरियाली देखी,
सोचा जीवन भी महकेगा,
केवल मिलन की आस जगाने,
इस बार भी आया सावन।

छम-छम जब वर्षा हुई,
सुलगा  उठी यादें पुरानी,
मंद-मंद जब पवन चली,
हलचल दिल में  मचा गया  सावन।

फूल खिले केवल  ज़ख़्मों के
हिज्र  के गीत पंछी सुनाएं।
बार बार बादल  गरजें,
आया सावन, न भाया सावन।

पपपीहे  तुम उनके पास जाना,
मेरे ये गीत, उनको सुनाना,
न भी सुने, तुम गाते जाना,
बीत न जाए जब तक सावन।

गुरुवार, जुलाई 17, 2014

यादें...



टूट गये खिलौने सब,
नहीं हैं  वो मित्र अब,
बजपन की अब मेरे पास,
यादें हैं केवल शेष,
इनसान चले जाते हैं,
फिर लौटकर नहीं आते हैं,
हमारे पास वो  केवल,
कुछ यादें छोड़ जाते हैं...

जीवन के इस लंबे सफर में,
मिलते हैं कयी इनसान,
कौन कब तक साथ चलेगा,
हम सभी हैं इस से अन्जान,
वृक्ष के सभी फूल भी,
अलग अलग मुर्झाते हैं...
हमारे पास वो  केवल,
कुछ यादें छोड़ जाते हैं...

असीम और अनोखा है,
यादों का ये संसार,
बीते हुए दिन हमे,
याद आते हैं बार बार,
जो दिल में जगह बना ले,
वो बहुत ही   याद आते हैं...
हमारे पास वो  केवल,
कुछ यादें छोड़ जाते हैं...

ये यादें ही दिलों में,
मिलन की आस जगाती  हैं,
बिछड़े हुए इनसानों से,
ख्वाबों में भी मिलवाती हैं,
कुछ यादें तो हंसाती हैं,
कुछ से नैन भर आते हैं...
हमारे पास वो  केवल,
कुछ यादें छोड़ जाते हैं...

अगर ये यादें न होती,
निरस होता हमारा जीवन,
जाने वाले चले जाते,
लगता केवल सूनापन,
अतीत को याद करके ही,
हम नयी राह बनाते हैं...
हमारे पास वो  केवल,
कुछ यादें छोड़ जाते हैं...

सोमवार, जुलाई 14, 2014

प्रेम नहीं है...



साथ रहना,  प्रेम नहीं है,
लबों से कहना, प्रेम नहीं है,
जलता है पतंगा मौन रहकर,
किसी को जलाना, प्रेम नहीं है...

आता है जब भी सावन,
महकाता  है खुद धरा को,
खुद  ही, सजना संवर्ना,
दिखावा है, प्रेम नहीं है...

बेवफाई की साहेबा ने,
बेचारा मिर्जा ऐसे न मरता,
बेवफाई करके जान देना,
खुदगर्जी है, प्रेम नहीं है...

करता है, सुमन प्रेम जग से,
लुटाता है, सर्वस्व अपना,
माली तुम्हारा इन फूलों से,
स्वार्थ है, प्रेम नहीं है...

तन से तन के मिलन को,
कहते हैं सच्चा प्रेम,
प्रेम है पावन चंदन सा,
तन से  आकर्षण, प्रेम नहीं है...