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गुरुवार, नवंबर 05, 2015

मेरा महत्व कितना है..

बोला पुष्प
हंस कर
निज वृक्ष से
तुम्हारा महत्व
मेरे बिना
कुछ भी नहीं है...
जब खिलता हूं मैं
तभी आते हैं सब
वर्ना तुम्हारे पास
मानव तो क्या
पंछी भी नहीं आते
निहारते हैं सब मुझे ही...
कहा वृक्ष ने
सुनो प्रीय
तुम खिलते रहो
सदा ऐसे ही
होता बस में
तुम्हे अमर बनाता...
मैं तो बस
जीवन देता हूं
सब को ही
जैसे दिया तुम्हे भी
न सोचा कभी भी
मेरा महत्व कितना है..

गुरुवार, अक्टूबर 15, 2015

पुष्प और कवि....

मैं पुष्प हूं
भावनाओं से युक्त
मुझे माली नहीं
कवि प्रीय है...
कवि  मुझे
कभी नहीं तोड़ता
न वो केवल
सौंदर्य ही देखता है...
वो  अक्सर
आता है
पूछता है मुझसे
मेरे मन की बात...
दिखावा तो
करते हैं सब
प्रेम हम से भी
करता है कवि ही...
मुझे माली ने
लगाया भी
और पाला भी
पर स्वार्थ के लिये...
कौन कहता है
मैं नशवर हूं
मेरा मिटना तो
परोपकार का संदेश है...

सोमवार, दिसंबर 01, 2014

दुर्भाग्य उस पुष्प का।

फूल टूटने  के बाद भी
लगते हैं सुंदर
कहीं माला में
कहीं मंदिर में
कभी अर्थी पर
कभी विवाह में।

तोड़ने से पहले
नहीं पूछते इनसे
क्या ये चाहते  हैं  अलग होना
अपनी उस  डाली से।
जिसने दिया है
इन्हे  ये सौंदर्य।

एक सुंदर   फूल
जिसे गुमान था
 अपने सौंदर्य पर
चाहता था स्पर्श पाना
रति सी किसी    सुंदरी का
ताकि मिलन हो
सौंदर्य से सौंदर्य का।

दुर्भाग्य उस पुष्प का
उस दिन प्रातः  ही
तोड़कर ले गये उसे
एक भ्रष्ट  नेता की
अर्थी पर चढ़ाने के लिये।
उसकी चाह और  ख्वाब,
वो सौंदर्य भी
उस अर्थी के साथ
राख हो गये मिनटों में।

बुधवार, जुलाई 23, 2014

आज भी मुझ को...

उस दिन मैं, जब मिला था तुम से,
वो दिन  याद है, आज भी मुझ को,
तुम्हारी प्यारी-प्यारी बातें,
सुनाई देती हैं, आज भी मुझ को...

साक्षी  है वो वृक्ष आज भी,
छाया मैं जिसकी बैठे थे,
मंद-मंद वो शीतल पवन,
देती है शीतलता,   आज भी मुझ को...

चाहता था मैं साथ चलना,
तुम्हे ये मंजूर नहीं था,
जहां हम अलग हुए,
बुलाता है वो मोड़, आज भी मुझ को...

शायद तुम भूल गयी हो,
वो सावन, वो रिमझिम वर्षा,
 प्रेम के  फूल, जो सूख गये हैं,
देते हैं खुशबू, आज भी मुझ को...

रविवार, अगस्त 04, 2013

चलो कोई बात नहीं...



हम दोनों थे सुंदर चमन था, खिले हुए थे प्यारे फूल,
जलाया उसे खुद तुमने, चलो कोई बात नहीं।...

तुम न रोए,  रोए बाकि सब, देख झुलसाए फूलों को,
रोया मैं भी, क्या करता, चलो कोई बात नहीं।...

सूरज ने भी,   चांद ने भी,  तारों ने भी दिया सब को प्रकाश,
मैं दीपक जलाकर भी अंधेरे में रहा, चलो कोई बात नहीं।...

आया सावन, सावन ने, दी बिना मांगे सब को खुशियां,
मैं मंदिर से भी खाली लौटा, चलो कोई बात नहीं।...

शनिवार, जुलाई 27, 2013

अहंकार



गुल था मैं गुलजार का,
पात्र था सब के प्यार का,
मुझसे चमन की रौनक थी,
मैं राजा था बहार का...

कामदेव सा सौंदर्य था,
न दूसरा था कोई मुझसा,
सभी गले मिलते थे,
 मनका  था मैं  गले के हार का...

मुर्झाते हुए फूलों पर,
हंसता था मैं अक्सर,
न समझा कभी माली को,
निष्ठुर था दिवार सा...

बैरी पवन  ऐसी चली,
धरा पे मुझे गिरा गयी छली,
मेरी हस्ती मिटने लगी,
न महत्व घटा गुलजार का,

मुर्झाए  हुए फूल को,
मिट्टी और धूल को,
कोई गले नहीं लगाता,
दस्तूर है संसार का...

जीवन में कभी अहंकार न करना,
मेरी तरह पछताओगे वरना,
मैं अल्प आयू में मुर्झा गया,
ये सिला मिला अहंकार का...