गुरुवार, नवंबर 05, 2015

मेरा महत्व कितना है..

बोला पुष्प
हंस कर
निज वृक्ष से
तुम्हारा महत्व
मेरे बिना
कुछ भी नहीं है...
जब खिलता हूं मैं
तभी आते हैं सब
वर्ना तुम्हारे पास
मानव तो क्या
पंछी भी नहीं आते
निहारते हैं सब मुझे ही...
कहा वृक्ष ने
सुनो प्रीय
तुम खिलते रहो
सदा ऐसे ही
होता बस में
तुम्हे अमर बनाता...
मैं तो बस
जीवन देता हूं
सब को ही
जैसे दिया तुम्हे भी
न सोचा कभी भी
मेरा महत्व कितना है..

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (06-11-2015) को "अब भगवान भी दौरे पर" (चर्चा अंक 2152) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बहुत सुंदर प्रस्तुति !

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