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सोमवार, मई 02, 2016

जो आदमी को, इनसान बना सके...

एक धर्म था
वैदिक धर्म
एक जाती थी
मानव जाती,
एक भाषा थी
जिस में वेद रचे,
एक शिक्षा थी,
वैदिक शिक्षा,
एक लोक था
भूलोक....
नाम के लिये,
आज धर्म कई हैं,
जातियों की तो
गिनती नहीं हैं,
हर भाग की
अपनी भाषाएं हैं,
शिक्षा का कोई
अब आधार नहीं है,
धरा बंट चुकी है
कई भागों में...
जब से बंटा है
ये सब कुछ,
बंटा है तब से 
 मानव भी  कई भागों में।
न अमन है कहीं,
न सुखी है कोई।
न वेदों का ज्ञाता है कोई,
जो पथ दिखा सके।
वो धर्म ही  खंडित हुआ है,
जो आदमी को, इनसान बना सके...




बुधवार, अगस्त 12, 2015

ये अमर गाथा आजादी की।

जब लहराता है
 लाल किले पर
अखंड देश का
 प्यारा  तिरंगा
झुक जाता है
मस्तक मेरा
करने को नमन
इन शहीदों को।

हमारी तरह ही
अगर ये भी
सुख वैभव से
जीवन जीते।
हम आज भी
जकड़े होते
विदेशियों की
प्राधीन बेड़ियों में।

कहा माओं से
बुला रही है मां
तेरे दूध की
परीक्षा है।
आने वाले
कल की खातिर
मांग रही हैं तुमसे
तुम्हारा आज।

हम माएं है इनकी
केवल इस जन्म में
तुम मां हो
युगों-युगों से
सौ पुत्र भी
होते एक के
सहर्ष भेजते
चरणों में तुम्हारे।

जाओ बेटा
न देर करो
जाग उठा है
नसीब तुम्हारा।
ये जन्म भूमि ही
कर्म भूमि है
आज से
केवल तुम्हारी।



सूरज चांद
सितारों ने देखी
अनुपम  कुर्वानी
शहीदों की।
स्वर्णिम अक्षरों में
इतिहास ने लिखी
ये अमर गाथा
आजादी की।

शुक्रवार, जुलाई 31, 2015

मेरी भारतीय रुह


मेरी भारतीय रुह भी
आहत होती है
ऊधम सिंह  की
रुह की तरह
जब देखती  हैं मानव संहार
कहीं भी

 भारत से दूर
मदन लाल ढींगरा
या ऊधम सिंह  की
फांसी की खबर सुनकर
वो  भी   बहुत रोई थी
अपने वतन में
अपनों के साथ।

भगत सिंह, सुखदेव
और  राजगुरु
की फांसी से
भारत मां के साथ
मेरी रुह भी
 आहत  है आज तक


आज तक मेरी रुह
फांसी को केवल
निर्मम हत्या मानती थी
क्योंकि ये सब निर्दोष थे
फांसी केवल
निर्दोषों को मिला करती थी।

पर आज जब
अफजल, कसाब
या मेमन  को
फांसी दी गयी
मेरी आत्मा आहत नहीं हुई
क्योंकि वो भी भारतीय है।

बुधवार, जनवरी 21, 2015

आना है तो, महमान बनके आओ।

आना है तो,  महमान बनके आओ,
तुम क्या हो,  हमे न ये  दिखाओ,
तुम कौन हो,  पता है हमे
हम क्या है, ये भी जान जाओ...
तुम जैसे कयी आये
जय कह गये इस धरा की
जो देखोगे यहां तुम,
कहीं और हमे दिखाओ...
आकर्षण  है इस मिट्टी में
आते हैं सब बार बार,
हकीकत में जीवन जीयो,
ये दिखावा भूल जाओ...
जो देखा है तुमने आज,
हज़ारों वर्ष पहले यहां था,
क्या करना है हमें
हमे न ये सिखायो...

मंगलवार, मई 27, 2014

हम रहें या न रहें, रहेगा सदा वतन




[ भारत के नव नियुक्त प्रधानमंत्री माननीय मोदी जी द्वारा चुनाव से पहले या बाद में  अपने भाषणों में भारत मां की वंदना में कुछ शब्द कहे गये हैं, उन्हे ही कविता का रूप देने का प्रयास कर रहा हूं]

हम रहें  या  न रहें,
रहेगा सदा वतन,
खिलते रहेंगे, नये फूल,
महकता रहेगा सदा ये   चमन...

असंख्य हैं सुत मां के,
जो चाहत न रखते कुछ भी मां से।
करते अपना सर्वस्व अर्पण,
साक्षी है 10 दिशाएं, गग्न.........

अनेकों वीर,  शहीद हुए,
कुछ वतन के लिये,  ही जिये,
पटेल   जैसे सपूतों ने,
दिया मां को, सुर्क्षा का वचन...

कर सकूं सेवा,  मैं भी मां की,
जीवन सफल,  होगा तभी,
मां मुझे केवल  ये शकती दो,
कोटी कोटी, तुम्हे नमन...

गुरुवार, अक्टूबर 31, 2013

धरा मानव से कह रही है...



धरा मानव से कह रही है,
मुझे  तुमने बंजर   बनाया...
कर दिये जंगल बिलकुल  खाली,
नदियों का भी  जल सुखाया...

कहते हो तुम खुद को महान,
श्रेष्ठ है तुम्हारा ज्ञान, विज्ञान,
केवल चंद वर्षों के सुख के लिये,
सदियों का सुख लुटाया...

मिटा दिये तुमने असंख्य जीव,
टिकी हुई थी जिन पे मेरी नीव,
तुम्हारे नित्य नये आविष्कारों ने,
मुझे केवल असहाय बनाया...

पीड़ा से  जब मैं कराही,

हड़कंप  मचा हुई तबाही,
आंसू बहे तो बाड़ आयी,
हिली ही केवल,  भूकंप आया...

कब होगी तबाही, जान लिया,
दोषी भी खुद को मान लिया,
संभल जाओ वक्त अभी भी  है,
विनाश का निकट वक्त  है आया...





बुधवार, सितंबर 18, 2013

मैं खुश हूं इस धरा पर...



न स्वर्ग की आस है,
न सितारों की तलाश है,
 सुंदर है सब से मेरा घर,
मैं खुश हूं इस धरा पर...

 श्रेष्ठ  है यहां सब से कर्म,
पथ प्रदर्शक है धर्म,
पीर पैगंबर स्वर्ग से आये,
मैं खुश हूं इस धरा पर...

मां की मम्ता की छाया मिली,
पिता के स्नेह से जिंदगी खिली,
संबंध अनेकों अनेक बने,
मैं खुश हूं इस धरा पर...

पाप करें या पुन्य कमाएं,
मंदिर या मधुशाला जाएं,
बुद्धि, विवेक से सोचना है ये,
मैं खुश हूं इस धरा पर...

जो चहा, उसने  वोही पाया,
 मिट्टी को भी स्वर्ण बनाया,
दुख सुख दोनों का  साथ है,
मैं खुश हूं इस धरा पर...