सोमवार, जुलाई 14, 2014

प्रेम नहीं है...



साथ रहना,  प्रेम नहीं है,
लबों से कहना, प्रेम नहीं है,
जलता है पतंगा मौन रहकर,
किसी को जलाना, प्रेम नहीं है...

आता है जब भी सावन,
महकाता  है खुद धरा को,
खुद  ही, सजना संवर्ना,
दिखावा है, प्रेम नहीं है...

बेवफाई की साहेबा ने,
बेचारा मिर्जा ऐसे न मरता,
बेवफाई करके जान देना,
खुदगर्जी है, प्रेम नहीं है...

करता है, सुमन प्रेम जग से,
लुटाता है, सर्वस्व अपना,
माली तुम्हारा इन फूलों से,
स्वार्थ है, प्रेम नहीं है...

तन से तन के मिलन को,
कहते हैं सच्चा प्रेम,
प्रेम है पावन चंदन सा,
तन से  आकर्षण, प्रेम नहीं है...


रविवार, जुलाई 06, 2014

रहेगा अनंत काल तक...



समय तो निराकार   है,
मैं कलम, साकार हूं,
मैं साक्षी हूं हर घटना की,
मैं कल भी थी,
आज भी हूं,
इस धरा पर मेरा अस्तित्व,
रहेगा अनंत काल तक...

आज से नहीं सदियों से,
हम दोनों साथ हैं,
समय  कहीं रुका  नहीं,
मैं कभी थकी नहीं.
हम दोनों का ये अटूट साथ,
रहेगा अनंत काल तक...

जो देखा मैंने,
वो लिखा मैंने,
मेरा लिखा इतिहास बना,
मेरा सिपाही अमर हुआ,
मेरा लिखा हर अक्षर,
रहेगा अनंत काल तक...

मैंने राम कथा लिखी,
जग को गीता का  उपहार दिया,
वेद पुराणों की रचना की,
हर युग का सत्य लिखा,
ज्ञान विज्ञान, सब मेरे कारण,
रहेगा अनंत काल तक...

जब चहा मैंने क्रांति लाई,
दोषियों को दंड दिलवाया,
भ्रम अस्त्र सा  है मेरा प्रहार,
सत्य मार्ग  है मेरा पथ,
सत्य, न्याय  और धर्म,
रहेगा अनंत काल तक...

शुक्रवार, जुलाई 04, 2014

कभी तो यहां भी आया करो...




[कौलिज के समय लिखी चंद पंखतियां, आज इस ब्लौग पर  प्रस्तुत कर रहा हूं]
कभी तो यहां भी आया करो,
नाम लेकर मेरा बुलाया करो,
हर महफिल रौशन है तुम से,
एक दीपक, यहां भी जलाया करो,

दिन उदास है तुम बिन,
दिखता है रात को ख्वाब तुम्हारा
अमावस है जीवन में आज कल,
चांद बनकर छाया करो...

पुष्प से प्यारी तुम्हारी मुस्कान,
कोयल से मीठी  तुम्हारी  वाणी,
सौंदर्य में तुम रति हो,
प्रेम गीत, कंठ से गाया करो...

सोचता हूं कभी कभी,
तुम किस जहां की हूर हो,
आयी हो यहां किस के लिये,
ये सच्च भी बताया करो...

मंगलवार, जुलाई 01, 2014

ये अंतिम मुलाकात है...



मेरे नैन नम थे,
तुम भी उदास थी,
जानते थे हम दोनों ही,
ये अंतिम मुलाकात है...

तुम ने राह अलग कर ली,
मेरा पथ अलग होना ही था,
वक्त को यही मंजूर था,
ये अंतिम मुलाकात है...

खामोश रहे चमन के गुल,
दिवारें सब देखती रही,
चले गयी आखिर तुम भी,
ये अंतिम मुलाकात है...