रविवार, जुलाई 06, 2014

रहेगा अनंत काल तक...



समय तो निराकार   है,
मैं कलम, साकार हूं,
मैं साक्षी हूं हर घटना की,
मैं कल भी थी,
आज भी हूं,
इस धरा पर मेरा अस्तित्व,
रहेगा अनंत काल तक...

आज से नहीं सदियों से,
हम दोनों साथ हैं,
समय  कहीं रुका  नहीं,
मैं कभी थकी नहीं.
हम दोनों का ये अटूट साथ,
रहेगा अनंत काल तक...

जो देखा मैंने,
वो लिखा मैंने,
मेरा लिखा इतिहास बना,
मेरा सिपाही अमर हुआ,
मेरा लिखा हर अक्षर,
रहेगा अनंत काल तक...

मैंने राम कथा लिखी,
जग को गीता का  उपहार दिया,
वेद पुराणों की रचना की,
हर युग का सत्य लिखा,
ज्ञान विज्ञान, सब मेरे कारण,
रहेगा अनंत काल तक...

जब चहा मैंने क्रांति लाई,
दोषियों को दंड दिलवाया,
भ्रम अस्त्र सा  है मेरा प्रहार,
सत्य मार्ग  है मेरा पथ,
सत्य, न्याय  और धर्म,
रहेगा अनंत काल तक...

शुक्रवार, जुलाई 04, 2014

कभी तो यहां भी आया करो...




[कौलिज के समय लिखी चंद पंखतियां, आज इस ब्लौग पर  प्रस्तुत कर रहा हूं]
कभी तो यहां भी आया करो,
नाम लेकर मेरा बुलाया करो,
हर महफिल रौशन है तुम से,
एक दीपक, यहां भी जलाया करो,

दिन उदास है तुम बिन,
दिखता है रात को ख्वाब तुम्हारा
अमावस है जीवन में आज कल,
चांद बनकर छाया करो...

पुष्प से प्यारी तुम्हारी मुस्कान,
कोयल से मीठी  तुम्हारी  वाणी,
सौंदर्य में तुम रति हो,
प्रेम गीत, कंठ से गाया करो...

सोचता हूं कभी कभी,
तुम किस जहां की हूर हो,
आयी हो यहां किस के लिये,
ये सच्च भी बताया करो...

मंगलवार, जुलाई 01, 2014

ये अंतिम मुलाकात है...



मेरे नैन नम थे,
तुम भी उदास थी,
जानते थे हम दोनों ही,
ये अंतिम मुलाकात है...

तुम ने राह अलग कर ली,
मेरा पथ अलग होना ही था,
वक्त को यही मंजूर था,
ये अंतिम मुलाकात है...

खामोश रहे चमन के गुल,
दिवारें सब देखती रही,
चले गयी आखिर तुम भी,
ये अंतिम मुलाकात है...



गुरुवार, जून 26, 2014

हम से पूछिये...



क्यों खामोश हैं यहां सब, हम से पूछिये,
जानकर भी अंजान हैं सब, हम से पूछिये।
महफिलों  में चर्चा तो करते हैं सब,
यहां  न बोलेगा कोई, हम से पूछिये...
भीड़ में खड़े हैं, इक लंबी कतार में,
हाथ मिलाना भी मंजूर नहीं, हम से पूछिये...
क्या कहें इनको, जो कहते हों खुद को खुदा,
हकीकत क्या हैं इनकी, हम से पूछिये...
ये गिर्गिट है, जो जानते हैं रंग बदलना,
ये रिशते भी बदलते हैं, हम से पूछिये...

मंगलवार, जून 24, 2014

पावन है गुल...



सुन ऐ बुलबुल,
उस गुल ने,
प्रेम किया था,
केवल तुम से...

बुलबुलें कयी आयी,
सामने उसके,
हृदय में उसके,
केवल तुम थे...

सर्वस्व किया,
तुम पर अर्पण,
न मांगा कुछ भी,
न चहा तुम से....

बुलबुल का स्वार्थ,
देखा सबने,
गुल पावन है,
जग में सब से...