गुरुवार, जून 26, 2014

हम से पूछिये...



क्यों खामोश हैं यहां सब, हम से पूछिये,
जानकर भी अंजान हैं सब, हम से पूछिये।
महफिलों  में चर्चा तो करते हैं सब,
यहां  न बोलेगा कोई, हम से पूछिये...
भीड़ में खड़े हैं, इक लंबी कतार में,
हाथ मिलाना भी मंजूर नहीं, हम से पूछिये...
क्या कहें इनको, जो कहते हों खुद को खुदा,
हकीकत क्या हैं इनकी, हम से पूछिये...
ये गिर्गिट है, जो जानते हैं रंग बदलना,
ये रिशते भी बदलते हैं, हम से पूछिये...

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (27.06.2014) को "प्यार के रूप " (चर्चा अंक-1656)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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  2. बेहद सुन्दर रचना

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ये मेरे लिये सौभाग्य की बात है कि आप मेरे ब्लौग पर आये, मेरी ये रचना पढ़ी, रचना के बारे में अपनी टिप्पणी अवश्य दर्ज करें...
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