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शुक्रवार, जुलाई 12, 2013

यही तो संसार है...



जो कल थे वो आज नहीं है,
जो आज है कल जाएंगे,
जग में रौनक कम न होगी,
कल कोई और ही आयेंगे।
आना जाना जीवन मृत्यु,
यही तो संसार है...

स्वार्थ से ही  बंधे हैं,
सब रिशते नाते व परिवार,
मोह माया में लिप्त है केवल,
है खुद पर सब को अहंकार,
वैवनस्य, नफरत और घृणा,
यही तो संसार है...

बेहिसाब करता है धन अर्जित,
जैसे साथ ले जाना है,
शड़यंत्र  लड़ाई जघड़ों में,
बिताता जीवन सारा है,
झल लोभ और महत्वाकाक्षाएं,
यही तो संसार है...

चड़ते सूरज को स्लाम,
पत्थर को मारते हैं ठोकर,
सब कुछ यहां नशवर है,
उदास न होना कुछ भी खोकर,
जहां श्री राम सुखी न रह सके,
यही तो संसार है...



शनिवार, अक्टूबर 27, 2012

अदभुत माया


अनुपम है रचना तेरी रचनाकार, तुझे किस रूप में पूजे संसार।

सब को अलग रूप आकार दिया,  पर खुद क्यों कोई रूप लिया।

किसी उपवन में पतझड़ लायी,  किसी गुलशन को खूब महकाया,

सोचता हूं कभी कभी, ये जग तुने कैसा बनाया।


किसी को दिये ढेरों दुःख, किसी कि झोली में डाले सुख।

कोई तो गलीचों पर सोता है, कोई फुटपातों पर रोता है।

किसी को दी खूब हंसी, किसी को जी भर के रुलाया।

सोचता हूं कभी कभी, ये जग तुने कैसा बनाया।


किसी के बंगले अलिशान है, किसी कि छत बस आसमान है।

किसी कुल में हो रहा है विवाह, किसी कुल का बुझ गया है दिया।

कोई ढूंढ़े मरघट के लिये जमीन, किसी को तूने भूपति बनाया।

सोचता हूं कभी कभी, ये जग तुने कैसा बनाया।


अगर तु मनुज को दुःख देता, तेरा नाम प्रभु कोई लेता।

क्षमा दया को भूल जाता जन, पाषाण बन जाता उसका मन।

कहीं धूप कहीं है छांव,   अदभुत है प्रभु तेरी माया।

सोचता हूं कभी कभी, ये जग तुने कैसा बनाया।