बुधवार, अप्रैल 02, 2014

अंजान नहीं, हम जान गये



अंजान नहीं, हम जान गये,
हर चेहरे को पहचान गये।
शास्त्रि से देशभक्त आज भी हैं,
वो बेवजह ही बदनाम हो गये...
कहीं क्षेत्रवाद, कहीं वंश वाद,
कोई छाड़ू उठाकर हुआ  आवाद,
झूठे वादों सेसिंहासन पाया,
जीतने पर भगवान हो गये...
फूलों के हार भी  पहनाए,
चर्णों में तुम्हारे मस्तक झुकाए,
जो कहा, वो कुछ भी न किया,
पांच वर्ष भी तमाम हो गये...
वोट मांगने का बदला है  अंदाज,
जान गयी जंता, न मिलेगा ताज,
जनसेवक चाहिये आज हिंद को,
भाषण, नुस्के नाकाम हो गये...

10 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन जीमेल हुआ १० साल का - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. उम्दा ... सुंदर रचना !!

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  3. बहुत सुन्दर और सटीक अभिव्यक्ति...

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  4. सुन्दर सम्प्रेषण सीधा साधा हिन्दुस्तानी सा

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  5. आज के हालात..यही हैें

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  6. जान गयी जंता, न मिलेगा ताज,
    जनसेवक चाहिये आज हिंद को,
    भाषण, नुस्के नाकाम हो गये...
    ..बहुत सही कहा आपने .. समय रहते जनता को चेतना जरुरी हैं ..राजनेताओं को गद्दी प्यारी होती है यह बात जनता जितने जल्दी समझ जाय उसी में देश और सबका हित है ..

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