सोमवार, दिसंबर 04, 2017

अब प्रतीक्षा है हमे तुम्हारे निज धाम आने की...




<iframe>ओ श्री राम,
तुम्हे त्रेता में भी वनवास मिला
इस कलियुग में भी।
वो वनवास चौदह वर्ष के लिये था
ये वनवास न जाने कितना लंबा होगा....</iframe>
<iframe>अगर तुम्हे वनवास न मिलता,
अहिलया का उधार कैसे होता,
मां शबरी की इच्छा अधूरी रह जाती,
न सुगरीव को न्याय मिल पाता,
असुरों का विनाश कौन करता....</iframe>
<iframe>जब मिलता है तुम्हे वनवास
प्रसन्न होते हैं देवगण
क्योंकि वे जानते हैं
वनवास के दिनों में ही तुम,
धरा को असुरों से मुक्त करते हो....</iframe>
<iframe>न शक्ति थी किसी में
मंदिर का एक  पत्थर भी हिला सके,
धर्म की रक्षा के लिये ही
फिर तुम्हे धाम त्यागना पड़ा होगा,
ये  देवों की इच्छा से हुआ होगा....</iframe>
<iframe>ये आतंकवादी दानव
जालिम है असुरों से भी
ये जेहादी  बेवजह ही
कहीं भी कुछ भी कर सकते हैं,
मुक्त कर दो धरा को इनसे...</iframe>
 <iframe>कांप रही है  धरा
भयभीत हैं देवगण
जेहादियों  के आतंग से
खतरे में है मानवता,
अब श्री राम पर ही विश्वास है....</iframe>


9 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (05-12-2017) को दरमाह दे दरबान को जितनी रकम होटल बड़ा; चर्चामंच 2808 पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बहुत सुन्दर‎ रचना‎ .

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  3. नमस्ते, आपकी यह प्रस्तुति "पाँच लिंकों का आनंद" ( http://halchalwith5links.blogspot.in ) में गुरूवार 07-12-2017 को प्रकाशनार्थ 874 वें अंक में सम्मिलित की गयी है। प्रातः 4:00 बजे के उपरान्त प्रकाशित अंक चर्चा हेतु उपलब्ध हो जायेगा।
    चर्चा में शामिल होने के लिए आप सादर आमंत्रित हैं, आइयेगा ज़रूर। सधन्यवाद।

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  4. बहुत सुन्दर‎ रचना‎....

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ये मेरे लिये सौभाग्य की बात है कि आप मेरे ब्लौग पर आये, मेरी ये रचना पढ़ी, रचना के बारे में अपनी टिप्पणी अवश्य दर्ज करें...
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