शनिवार, दिसंबर 23, 2017

ओ जाते हुए वर्ष,

ओ जाते हुए वर्ष,
जब तु आया था,
जोष था, उमीदे थी,
सब ओर हर्ष छाया था....
मुझे भी प्रतीक्षा थी तेरी,
कई दिनों पहले से ही,
अभिनंदन मैंने भी किया था तुम्हारा,
उमीद में कुछ नये की....
पर तब मैं नहीं जानता था,
तु मेरे लिये  नया कुछ भी  नहीं लाया है,
जो तब मेरे पास था,
तु उसे मुझसे छीनने  आया है....
हम पुराने से अच्छा
नये को मानते हैं,
नया क्या लेकर आयेगा,
हम नहीं जानते हैं....
जब भी कुछ नया होता है,
अच्छा होगा, हम मन को बहलाते हैं,
होनी तो होकर रहती है,
चंद पलों के लिये खुश हो जाते हैं.....

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें

ये मेरे लिये सौभाग्य की बात है कि आप मेरे ब्लौग पर आये, मेरी ये रचना पढ़ी, रचना के बारे में अपनी टिप्पणी अवश्य दर्ज करें...
आपकी मूल्यवान टिप्पणियाँ मुझे उत्साह और सबल प्रदान करती हैं, आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है !