मंगलवार, अप्रैल 26, 2016

ये जाति वंश का भेद

मैं करण हूं
मुझे याद है
अपनी भूलों पर
मिले हर श्राप
पर मैं मुक्त हो चुका था
हर श्राप  से।
मैंने तो बस
सब कुछ लुटाया ही था
किसी से कुछ नहीं मांगा,
अपनी मां से भी नहीं।
हे कृष्ण
तुम साक्षी हो....
मैं नहीं जानता
ये वंश  भेद का
श्राप  मुझे किसने दिया
न मैं ये जानता हूं,
ये श्राप  मुझे क्यों मिला
न निवारण ही जानता हूं।
ये श्राप मुझे
मेरे हर जन्म में
मेरी योग्यता पर
प्रश्न चिन्ह लगाता है।
कल सूत पुत्र था
और आज क्षत्रीय....
कल रंगभूमि  में
भी  मेरा वंश पूछा गया था
आज हर साक्षातकार में
मेरी जाति   देखी जाती है।
सब जानते थे
सर्वश्रेष्ट धनुर धारी हूं मैं
आज भी मेरे पास
अनुभव,  नंबर अधिक है  सब से।
मैं कल भी छला गया था
और आज भी।
ये  जाति वंश का भेद
बाधक है प्रगती में
मारता है योग्यता को  
बांटता है राष्ट्र   को....


  


4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 27 अप्रैल 2016 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. कर्ण तो जातिगत दंश से पीड़ित था लेकिन आजकल तो उल्टा हो रहा है लोगों को आरक्षण चाहिए बस, चाहे उसके लिए कुछ भी करना।
    प्रेरक प्रस्तुति

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (27-04-2016) को "हम किसी से कम नहीं" (चर्चा अंक-2325) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " श्रीनिवास रामानुजन - गणित के जादूगर की ९६ वीं पुण्यतिथि " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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